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Dhanno, Basanti Aur Basant ( धन्नो, बसन्ती और बसन्त )

Author: विवेक रंजन श्रीवास्तव

Hindi

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व्यंग जहाँ गुदगुदाता है वहीं समाज को शिक्षा भी देता है , सम सामयिक घटनाओ पर भी विवेक रंजन जी इस तरह लिखते हैं कि रचना बार बार पठनीय बन जाती है, पिछले दशको में हास्य और व्यंग एक नयी साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुआ है . हास्य और व्यंग में एक सूक्ष्म अंतर है , जहां हास्य लोगो को गुदगुदाकर छोड़ देता है वही व्यंग हमें सोचने पर विवश करता है . व्यंग के कटाक्ष हमें तिलमिलाकर रख देते हैं . व्यंग्य लेखक के संवेदनशील और करुण हृदय के असंतोष की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होता है . शायद व्यंग , उन्ही तानो और कटाक्ष का साहित्यिक रचना स्वरूप है , जिसके प्रयोग से सदियो से सासें नई बहू को अपने घर परिवार के संस्कार और नियम कायदे सिखाती आई हैं और नई नवेली बहू को अपने परिवार में घुलमिल जाने के हित चिंतन के लिये तात्कालिक रूप से बहू की नजरो में स्वयं बुरी कहलाने के लिये भी तैयार रहती हैं . व्यंग्य यथार्थ के अनुभव से ही पैदा होता है .इशारे से गलती करने वाले को उसकी गलती का अहसास दिलाकर सच को सच कहने का साहस ही व्यंगकार की ताकत है . पुस्तक में संकलित वयंग लेख इन कसौटियो पर खरे उतरते हैं

  • Release Date:
  • Book Size: 369 KB
  • Language: Hindi
  • Category: Hasya Vinod

  • 2017-04-16 11:06:12.0

    Vivek Ranjan Shrivastava


  • 2017-03-17 01:40:53.0

    Prashant P


  • 2017-03-16 20:12:02.0

    Naresh kumar


  • 2017-03-13 08:15:54.0

    online






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