पहले से ही बढ़ती स्कूल फीस, किताबों और यूनिफॉर्म के खर्च के बीच अब बस किराये में हुई वृद्धि ने बच्चों की शिक्षा को और महंगा बना दिया है.
हाल के सालो में स्कूलों के संचालन से जुड़ी लागत में लगातार बढ़ोतरी हुई है.
इसका असर अब परिवहन शुल्क के रूप में अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है. कई स्कूलों और बस ऑपरेटरों ने इस सत्र में बस किराए में 10 से 30 फीसदी तक की बढ़ोतरी की है.
स्कूल प्रबंधन की तरफ से कहा जा रहा है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि इसका सबसे बड़ा कारण है. डीजल और पेट्रोल के बढ़ते दामों के चलते स्कूल बसों को चलाने की लागत लगातार बढ़ रही है. इसके अलावा ड्राइवरों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, वाहन बीमा, मरम्मत और रखरखाव पर होने वाला खर्च भी पहले की तुलना में काफी अधिक हो गया है.
सिर्फ ईंधन और रखरखाव ही नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा से जुड़े नए नियमों ने भी स्कूलों के खर्च को बढ़ाया है. सरकार और संबंधित एजेंसियों की ओर से स्कूल बसों में जीपीएस ट्रैकर, सीसीटीवी कैमरे और कई मामलों में महिला अटेंडेंट की व्यवस्था जरूरी की गई है.
इन सुविधाओं से बच्चों की सुरक्षा तो बेहतर हुई है, लेकिन इनके संचालन और रखरखाव की अतिरिक्त लागत भी स्कूलों को उठानी पड़ रही है.
हालांकि, बस किराये में बढ़ोतरी शिक्षा के बढ़ते खर्च का केवल एक हिस्सा है. हर साल स्कूलों में ट्यूशन फीस, एडमिशन फीस, वार्षिक शुल्क, किताबों और यूनिफॉर्म की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है. ऐसे में मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा का बजट लगातार बढ़ता जा रहा है.

