• Download Dailyhunt App

Sign UP / Sign In



 

Category

Home > Hindi > Zindagi Ke Lens Se

Zindagi Ke Lens Se ( जिंदगी के लेंस से )

Author: धीरेन्द्र पुंडीर

Hindi

38

  • My Rating


  • Review Title


  • Review Comment



To read this book you need to Download the Dailyhunt App on your phone. Available in Android, Windows & Iphone

गांव में छुट्टियां खत्म कर वापस शहर लौट रहा था बड़े भाई के साथ। बचपन था। उम्र का अंदाजा नहीं है। शहर में आने के बाद बस स्टैंड और घर के बीच के फासले में एक पिक्चर हॉल था। भैय्या को जाने क्या सूझा कि वो मुझे लेकर उस सिनेमा हॉल के अंदर रंगीन पोस्टर देखने के लिए घुस गए। पोस्टर के समय देखा कि नीचे वाले दरवाजें पर टिकट चैकर नहीं था। और भाई ने मेरा हाथ पकड़ा दरवाजा खोला और दरवाजें पर लटका भारी परदा खिसका दिया। घुप्प अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था कि सामने फिल्मी पर्दें पर रंगों से चमकती तस्वीरें दिखने लगी। जादू की दुनिया जैसा सब कुछ। इससे पहले कि समझूं कि क्या है बाहर से टिकट चैकर ने हाथ पकड़ा और बाहर खींच लिया। पर्दें का जादू खत्म और बाहर की दुनिया में फिर से आंखों को सामान्य सा दिखने लगा। इस घटना के महीनों बाद तक मुझे वो सिनेमा हॉल एक एक जादू की दुनिया का दरवाजा दिखने लगा जिसमें मेरा प्रवेश अभी निषिद्ध था। आजतक सोचता हूं कि उस वक्त उस सिनेमा हॉल में कौन सी फिल्म चल रही थी कौन हीरो था और कौन विलेन। और अगर पता भी चल जाएंगा तो क्या मेरी जिंदगी और सोच में कोई बदलाव आएंगा या एक अधूरी सी कहानी की तरह से वो मुझे न देखे गए रास्तें की तरह हुलसाता रहेगा। बचपन में सैंकड़ों ऐसी तस्वींरों के साथ बड़ा हुआ लेकिन ये तस्वीर मुझे हमेशा ललचाती है एक ऐसी दुनिया जो सबके लिए बेहद सामान्य हो लेकिन मैंने नहीं देखी तो मुझे अपनी ओर खींचती रहे। गांव से शहर और शहर से गांव का सिलसिला अभी तक की जिंदगी का अहम हिस्सा है। और एक उलझन और सुलझाव भी। गांव में कभी गांव का लड़का नहीं बन पाया। घरों के आस-पास के लोगों के लिए एक शहरी बच्चा जिसके माता-पिता अब नाम के लिए गांव के है। और जो गांव में अपने सयुंक्त परिवार में छुट्टियां बीताने आता है इससे ज्यादा गांव की जिंदगी का उसके लिए कुछ भी नहीं। और शहर में एक ऐसे लड़के के तौर पर जो गांव का रहने वाला है जिसके पिता गांव से अपने बच्चों को शहर पढ़ाने के लिए लाए है। जो अभी भी शहर के तौर-तरीके नहीं सीख पाया है। छुट्टियों में जिसके पास नईं फिल्में या फिर क्रिकेट मैच के कोई प्लॉन नहीं होते है। ऐसे ही चलते-चलते शहर से दिल्ली और फिर दिल्ली से देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचा। गांव में गरीबी, भूख, लाचारी या फिर ऐसी दूसरी असमानताओं से सीधा रिश्ता नहीं जुड़ा। एक तो अपर कॉस्ट होने के नाते और दूसरा शहरी बच्चा होने के नाते बेहद संरक्षण में रहता था तो किसी के घर जाना बेहद कम था सिर्फ घर से खेत और खेत से घर के बीच की दुनिया में जितना समझ आता गया वो जिंदगी के सफर का हिस्सा बना। और शहर में एक खास वर्ग के बीच जाना इसलिए मुश्किल था कि मैं उनको समझना नहीं चाहता था और वो मुझसे में किसी दिलचस्पी की तलाश करना नहीं चाहते थे। लिहाजा गांव की सीमाएं और शहर की जिंदादिली के बीच कही थमा हुई सी रेखाओं में घूमता रहा हूं। हर आम आदमी की तरह से बस, ट्रैन या फिर प्लेन में यात्रा के दौरान खिड़की की सीट की ललक रखता रहा। फिर सोचा कि क्या कारण है कि खिड़की से बाहर देखना हमेशा अच्छा लगता है। लगा कि हर इंसान बिना दृश्यों में शामिल हुए हर चीज को देखना चाहता है निरपेक्ष भाव से सुंदर या असुंदर कुछ भी। खिड़की से दुनिया देखना एक तिलिस्म में घुसना बिना उसकी चाबी तलाशें हुए। अपनी आदत का ऐसा ही विस्तार दिखा जिंदगी की ज्यादातर घटनाओं में शामिल न होने के बावजूद देखना हमेंशा लगा कि जैसें जिंदगी एक लैंस से देख रहा हूं और ये लैंस जिंदगी का लैंस है। लिखने का शौंक लेखक के नाते नहीं दिखा। बस जब मन करता कुछ लाईने खींच देता था शब्दों से। कभी नही अहसास किया कि इसको लोगो से साथ बांटना चाहिएं क्योंकि ये दुनिया की अरबों आंखों में से एक आंख का आईना है हो सकता है कुछ लोग इस लैंस से भी देखना चाहे। पत्रकारिता के आईने में इतनी सारी तस्वीरें इतने सारे रंग देंखे। हर बार लगता रहा कि यहां मुझे पहले आना चाहिए था। इसको मुझे पहले देखना चाहिए था। लेकिन मैं उस वक्त ही देख पाया जब देखना था। इसीलिए सोशल मीडिया में घुसने और एक ब्लॉग बनाने तक कविताओं की दर्जनों डायरियां गुम होती गई। वैसे भी मैं मानता हूं कि आवेग में लिखी गई कविताओं की कोई उम्र नहीं होती। कई बार कुछ दिन और कई बार कुछ घंटें लिहाजा मेरी कविताओं सिर्फ मेरे ब्लॉग पर रखा और ब्लॉग का पता अपने तक सीमित। कविताओं का समय पिछले छह-सात साल के बीच का है। उस वक्त जब दुनिया में जो घट रहा था सोशल मीडिया से क्रांत्रि की आवाज के तौर पर बाहर आ रहा था। इसी बीच में मुखौंटे के उतरने और लगाने के बीच असली चेहरों की पहचान में कई बार कामयाब हुआ तो कई बार गच्चा खाया। इंसान की व्यक्तिगत जिंदगी को उत्सव में बदलती खबरों और खबरों के बीच में गुम इंसानी हक-हूकुक की बातों ने दिन में भले ही घर न किया हो लेकिन रात में वहीं बातें नींद और आंखों के बीच कलम लाती रही। खबरों की चर्चा करते हुए कई बार अलग-अलग विषयों पर बात हुई संजय सिंह से। और फिर एक दिन उन्होंने फोन किया कि आपकी कविताओं को छापना है। ये बात मेरे लिए काफी आश्चर्य करने वाली थी लिहाजा मैंने उनसे एक दो बार नहीं कम से कम दस बार सोचने के लिए कहा और वो हर बार मेरी कविताओं को क्रम देने की बात करते रहे। अब मैं हैरान हूं कि उनको कविताओं में क्या दिख रहा। खैर मेरा खुद से बात करने का सिलसिला तो चलता ही रहेगा। लेकिन पहली बार इसमें से कुछ हिस्सा दोस्तों के साथ शेयर कर रहा हूं तो ये संजय सिंह का प्रयास है।

  • Release Date:
  • Book Size: 1 MB
  • Language: Hindi
  • Category: Kavita

    Be the first to rate




Top

If you want to read ebooks please download our app in your favorite mobile