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एक बार जरूर होकर आएं शाहीन बाग, देखने को मिलेगा ख्वाबों का हिंदुस्तान

रात करीब 11.30 बजे हैं। हजारों नौजवान ढोल-नगाड़ों की धुन पर थिरकते हुए लोहड़ी का जश्न मना रहे हैं। साथ ही उनके लबों पर एक ही नारा हैः 'आवाज दो हम एक हैं।' पास ही नौजवानों का एक और ग्रुप सड़क पर बनी भारत की तस्वीर को घेरे खड़े हैं। इसमें हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई की एकता का पैगाम दिया गया है। यह ग्रुप फैज अहमद फैज की नज्म भी गा रहा हैः 'हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे।' यह वही नज्म है, जिसे हाल में आईआईटी, कानपुर के छात्रों ने जब गाया, तो प्रशासन को आपत्ति हो गई और अब वह इस बात की जांच कर रहा है कि यह नज्म कहीं भारत के हिंदुओं के खिलाफ तो नहीं है।

खैर। जैसे ही यह नज्म खत्म होती है, ये नौजवान हबीब जालिब की नज्म गाना शुरू कर देते हैंः 'ऐसे दस्तूर को, सुबहे बेनुर को, मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।' पास ही खड़ा एक अन्य ग्रुप एक साउंड बॉक्स पर इस धुन पर झूम रहा हैः 'ऐ वतन, ऐ वतन आबाद रहे तू।' वहीं मंच पर एक लड़की ने माइक संभाल रखी है। आजादी के नारे के बाद एक देशभक्ति गाना गाने के लिए एक नौजवान को आमंत्रित किया जाता है। वह नौजवान इस गाने से सबके दिलों में देशभक्ति की भावना भर देता हैः 'मेरा मुल्क मेरा देश, मेरा ये वतन, शांति का, उन्नति का, प्यार का चमन'। तमाम औरतें और लड़कियां तिरंगा लहराते हुए उसका साथ दे रही हैं।

यह नजारा दिल्ली के शाहीन बाग का है, जहां पिछले एक महीने से औरतें नागरिकता संशोधन कानून (कानून) का विरोध कर रही हैं। इस जगह का नाम पूरी दुनिया में मशहूर हो चुका है और लोग सही ही कह रहे हैं कि जिन्होंने यह जगह नहीं देखी, उसका जन्म ही नहीं हुआ। दिल्ली पुलिस और बीजेपी नेताओं की तमाम धमकियों के बावजूद ये महिलाएं सर्दी के इस मौसम में भी डटी हुई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इन्हें हटाने का आदेश देने से मना कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस-प्रशासन इन्हें समझाने-बुझाने का काम करे और उन्हें बताए कि उन्हें क्यों हट जाना चाहिए।

देश की राजधानी दिल्ली, हरियाणा के शहर- फरीदाबाद और उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर को जोड़ने वाली यह सड़क पिछले एक महीने से पूरी तरह बंद है। लेकिन कालिंदी कुंज की तरफ बढ़ने पर आपको सड़कों पर ही तरह-तरह की पेन्टिंग दिखाई देंगी जो देश की एकता-अखंडता के पक्ष में और नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पैगाम दे रही हैं। पीछे की तरफ कलाकारों ने एक इंडिया गेट भी बनाया है, जहां नौजवान सेल्फी लेते हुए नजर आते हैं। इससे आगे कुछ कलाकार लोहे से विशाल भारत का नक्शा बनाने में लगे हुए हैं। यह काम जाधवपुर यूनिवर्सिटी से आए पवन शुक्ला की देख-रेख में हो रहा है। पवन शुक्ला मूल रूप से आर्टिस्ट हैं। इन दिनों जाधवपुर यूनिवर्सिटी से कंपैरेटिव लिटरेचर में पीएचडी कर रहे हैं। उनके मुताबिक, पिछले 20 दिनों से वह लगातार शाहीनबाग में हैं और उन लोगों की कोशिश है कि सरकार और जनता के बीच जो कल्चरल गैप है, उसे कला के जरिये भरा जाए।

यह पूछने पर कि वह इस प्रोस्टेस्ट को कैसे देखते हैं, पवन कहते हैंः 'मैं इस प्रोटेस्ट को एक शुरुआत की तरह देखता हूं। हमारे देश के प्रधानमंत्री और सत्ता में बहुमत से बैठे हमारे प्रतिनिधियों ने अपना एक ऑडियंस बना लिया है। अब वे जो भी बातें बोलते हैं, अपनी ऑडियंस से मुखातिब होकर बोलते हैं। ऐसे में, शाहीन बाग एक बहुत ही मजबूत आवाज है, उन लोगों के लिए जिन्हें हमारी सरकार नजरअंदाज कर देना चाहती है।' पवन शुक्ला की राय है कि देश में सीएए को जिस तरह से लागू किया जा रहा है, इसके पीछे की रणनीति से हम सब वाकिफ हैं। वह इसे सिटीजनशिप घोटाला बताते हैं- 'इसमें जो ऊपर से दिख रहा है, अंदर में वैसा है नहीं। और इस अंदर के बारे में हमारी सरकार चर्चा नहीं कर रही है, बता नहीं रही है। सवाल पूछने पर उन सवालों को एड्रेस भी नहीं कर रही है। यह कानून समाज को बांटने वाला है।'

अब रात के करीब एक बज चुके हैं। फिज़ा में सर्दी बढ़ रही है। लेकिन शाहीन बाग का माहौल पूरी तरह गर्म है। यहां कई दिलदार लोग यहां आने वाले लोगों के बीच लगातार चाय बांट रहे हैं। तभी हमारी मुलाकात हुमैरा सैय्यद से होती है। 21 साल की हुमैरा इन दिनों मेडिकल की तैयारी कर रही हैं। लेकिन जबसे शाहीन बाग का प्रोटेस्ट शुरू हुआ है, वह अपना ज्यादातर वक्त यहीं दे रही हैं। हुमैरा शुरुआत के 20 दिनों तक लगातार रात के 12 बजे से लेकर तीन बजे तक मंच संभालने का काम करती थीं। उनका कहना है कि 'यह बात खुशी की जरूर है कि हमारी औरतें तमाम दीवारों को तोड़कर सड़कों पर हैं। लेकिन मेरा मानना है कि अब भी बेहद गरीब घरों की औरतें या अमीर घराने की महिलाएं इस प्रोटेस्ट में शामिल नहीं हैं। वे अब तक अपने घरों से नहीं निकल पाई हैं। अब हम सबकी कोशिश उनको घरों से निकालने की है। इसके लिए हम ने एक टीम तैयार की है, जो जल्द ही डोर टु डोर जाकर इस कानून से संबंधित लोगों में जागरूकता मुहिम चलाएगी।'

वहीं मिलीं 50 साल की मसूदा खातून का कहना है कि पीएम मोदी को हम औरतों के सामने झुकना पड़ेगा। मसूदा यहां सरिता विहार से पिछले 26 दिनों से रोजाना आ रही हैं। वह कहती हैं कि हिंदू-मुस्लिम एकता हमारी बुनियाद है, हम सब एक हैं और मुसलमानों के बुरे वक्त में हिंदुओं ने और हिंदुओं के बुरे वक्त में मुसलमानों ने एक-दूसरे का साथ दिया है। और इस प्रदर्शन में भी हमारी कई हिंदू बहनें यहां हैं, इसलिए कि वे इस कानून का काला सच जानती हैं। 28 साल की शबनम की कुछ दिन पहले ही शादी हुई है। यह पूछने पर कि आपके पति और ससुराल वालों को आपके यहां आने पर कोई आपत्ति नहीं है, वह कहती हैं कि 'ससुराल वालों ने ही कहा कि अब वक्त प्रोटेस्ट में रहने का है, क्योंकि वे जानते हैं कि यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। मेरा परिवार भी इस लड़ाई में शामिल है।'

इसी तरह, जामिया के छात्र उमर अशरफ बताते हैं कि वह दिन में जामिया में होते हैं और रात का वक्त इस शाहीन बाग के लिए है। उमर की दिलचस्पी इतिहास में काफी है। वह हेरिटेज टाइम्स नामक एक वेबसाइट चलाते हैं। उमर का कहना है कि 'इतिहास खुद को दोहरा रहा है। ठीक 100 साल पहले मोहम्मद अली जौहर की मां- बी अम्मा, यानी आबदी बानो बेगम पूरे भारत का दौरा कर रही थीं; हर शहर, हर गांव और हर मोहल्ले तक असहयोग और खिलाफत का परचम लेकर जा रही थीं, गली से लेकर नुक्कड़ तक अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लाए गए काले कानून- रॉलेट एक्ट के खिलाफ शुरू हुई असहयोग नीति का प्रचार कर रही थीं। ठीक 100 साल बाद औरतें फिर से सड़कों पर हैं। इन दादियों ने साफ कर दिया है कि ये सरकार के सामने और उनके काले कानून के सामने बिलकुल नहीं झुकेंगी।'

देश की बागी आग यानी शाहीन बाग के इस प्रोटेस्ट की सबसे खास बात यह है कि इसमें गोद के बच्चों से लेकर 80-85 साल की दादियां और नानियां शामिल हैं। यह बात भी ध्यान खींचती है कि यहां जयपुर, पंजाब, मेरठ, नोएडा और दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से औरतें शामिल हो रही हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि ईंट मजदूर से लेकर अपने अन्य मांगों को लेकर भी औरतें देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां आ रही हैं। उन्हें पता है कि दिल्ली के जंतर-मंतर के बजाए यहां उनको ज्यादा लोगों का साथ मिलेगा। यहां उनकी आवाज दबने नहीं दी जाएगी।

इस प्रोटेस्ट में सौरभ वाजपेयी भी नजर आते हैं। सौरभ दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाते हैं। वह लगातार कई दिनों से यहां आ रहे हैं। कुछ दिनों पहले अपनी 80 वर्षीया मां पुष्पा वाजपेयी और अपनी बड़ी बहन नवेदिता के साथ-साथ अपने पूरे परिवार के अन्य सदस्यों को लेकर आए थे। तब पुष्पा वाजपेयी यहां किसी सेलिब्रेटी से कम नहीं थीं। सौरभ बताते हैं कि आजादी के इन 70 सालों में मुसलमान कभी भी इतने कॉन्फिडेंस के साथ खुद एक एजेंसी बनकर सड़कों पर कभी नहीं उतरा था लेकिन इस कानून के खिलाफ पहली बार उतरा है। शाहीन बाग नागरिकता संशोधन कानून के विरोध का एक प्रतीक बन चुका है, जिसे अब पूरे देश में जगह-जगह दोहराया जा रहा है।

मैं अब अपने घर की तरफ लौट रहा हूं। सड़कें सुनसान हैं। किसी सवारी का दूर-दूर कोई नाम-ओ -निशान नहीं है। तभी एक जनाब बाइक मेरी बगल में रोकते हैं। मुझसे कहते हैं कि आइए, आपको आगे तक छोड़ दूं। बाइक पर बैठने के बाद मैं उनसे बातचीत शुरू करता हूं। इनका नाम सुलेमान है। वह बताते हैं कि घर की सारी औरतें शाहीन बाग में हैं। तो फिर आप वापस क्यों जा रहे हैं? इस पर उनका कहना है कि बच्चे घर में अकेले हैं। सुबह में बच्चों को स्कूल जाना है। आखिर उनका स्कूल जाना भी तो जरूरी है। भारत के भविष्य तो वही हैं न। अब जरूरी हो गया है कि हम अब अपनी दकियानूसी सोच से बाहर निकलें और खास तौर पर अपनी लड़कियों की तालीम पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें।

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