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सिंधिया और कमलनाथ में खुल्लमखुल्ला तकरार, जानिए क्यों है ये पूरा विवाद

15 साल बाद मध्यप्रदेश में सत्ता की स्वाद चखने वाली कांग्रेस में सिर फुटौव्वल जारी है। दिग्गज नेताओं के बीच जुबानी जंग अब सार्वजनिक हो गई है। सीएम कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच तनातनी खुलकर सामने आ गई है। सिंधिया के बागी तेवर पर अब तक शांत रहने वाले सीएम कमलनाथ ने शनिवार को दिल्ली में बहुत ही एग्रेसिव मोड में जवाब दिया है। जो इस बात के संकेत हैं कि कांग्रेस में ऑल इन नॉट वेल है।

दोनों दिग्गज नेताओं के बयान के बाद रविवार को भी दोनों खेमे के लोगों की तरफ से बयानबाजी जारी रही। लेकिन मध्यप्रदेश कांग्रेस के दोनों दिग्गज नेताओं के बीच यह जंग क्यों छिड़ी है। वहीं, तीसरे दिग्गज की क्या भूमिका है। इसे लेकर सियासी गलियारे में चर्चा शुरू हो गई है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या यह विवाद अब थमेगा या फिर और सुलेगगा। क्यों सिंधिया के मन में जो टीस है, वो गाहे बगाहे बाहर आ ही जाती है। सबसे पहले शुरुआत विवाद की नींव से करते हैं।

दरअसल, मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खूब मेहनत की। पंद्रह साल बाद दिसंबर 2018 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची। उस समय मध्यप्रदेश में सिंधिया समर्थकों और सिंधिया की भी यह चाहत थी कि वह सीएम बने। लेकिन उन्हें दरकिनार कर कमलनाथ को सीएम बना दिया गया। राहुल गांधी के खेमे से आने वाले सिंधिया को यह भी भरोसा दिया गया था कि केंद्र में सरकार आई तो महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जाएगा। इस बात की तस्दीक चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने की थी कि राहुल गांधी पीएम बनते हैं तो सिंधिया नंबर टू पर होंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

लोकसभा चुनाव के दौरान मध्यप्रदेश में अपनी सीट तक ही सीमित रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया परिणाम आने के बाद अपनी सीट भी गवां बैठे और न ही यूपी में अपने प्रभार वाले इलाके में पार्टी का खाता खुलवा पाए। नतीजा यह हुआ कि हार के बाद सिंधिया पार्टी में हासिए पर चले गए। उसके बाद वह कुछ दिनों तक वे बिलकुल साइलेंट मोड में रहे।

अगस्त-सितंबर के महीने में सिंधिया एक बार फिर से एक्टिव हुए। राहुल के इस्तीफे के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए भी उनकी नाम पर चर्चा हुई। लेकिन चर्चा के आगे कुछ नहीं हुआ। उसके बाद उनके समर्थक मंत्री और नेता उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देने की मांग करने लगे। कई मौकों पर सिंधिया कमलनाथ के सरकार के खिलाफ आवाज भी उठाते रहे। इसके जरिए वह नाराजगी जाहिर करते रहे। मगर पद के सवाल पर वह हमेशा यह कहते रहे कि मुझे पद की कोई लालसा नहीं है, मैं जनता का सेवक हूं।

सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए उनके समर्थकों ने तो कुछ महीने पहले कई शहरों में पोस्टर भी लगा दिए थे। कई जिलाध्यक्षों ने तो इस्तीफा तक दे दिया था। सिंधिया समर्थक मंत्री खुलकर बयानबाजी करने लगे थे। किसानों के कर्जमाफी को लेकर सिंधिया खुद ही कमलनाथ की सरकार पर सवाल उठाने लगे थे। विवाद बढ़ा तो सोनिया गांधी के दरबार में पंचायत हुई। कुछ दिन तक मामला शांत रहा। लेकिन एक बार फिर से यह विवाद सुलग गया है।

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद सीएम कमलनाथ अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं। साथ ही उन्होंने सोनिया गांधी के समक्ष अपनी पसंद भी बता चुके हैं। वो या तो अपने गुट के किसी नेता या फिर कोई आदिवासी चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर चाहते हैं। ताकि सरकार और संगठन में तालमेल बना रहा। लेकिन सिंधिया और उनके समर्थक चाहते हैं कि अध्यक्ष ज्योतिरादित्य ही बने।

सियासी जानकार मानते हैं कि अगर सिंधिया अध्यक्ष बनते हैं तो सरकार और संगठन में तालमेल बैठाना आसान नहीं होगा। साथ ही मध्यप्रदेश कांग्रेस में दो पावर सेंटर भी हो जाएगा। इसकी वजह से मुश्किलें और बढ़ जाएगी। ऐसे में आलाकमान के लिए भी प्रदेश में अध्यक्ष का चुनाव करना एक मुश्किल काम है। लेकिन सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद कमलनाथ ने जरूर कहा है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति जल्द होगी। मगर यह नहीं बताया कि कौन होगा।

दरअसल, ज्योतिरादित्य सिंधिया चार दिन पहले मध्यप्रदेश के दौरे पर थे। टीकमगढ़ में उन्होंने एक सभा के दौरान अतिथि शिक्षकों के समर्थन में यह कह दिया कि अगर आपकी मांगे पूरी नहीं होगी तो हम आपके साथ सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे। इसके बाद सीएम कमलनाथ ने भी दो टूक जवाब देते हुए कह दिया कि तो वो उतर जाएं।

हालिया विवाद पर भले ही दिग्विजय सिंह यह कह रहे हों कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जी के मन में ऐसा कुछ नहीं है। हम सभी लोग साथ हैं। लेकिन सियासी जानकार बताते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह में एक रोड़ा दिग्विजय सिंह भी हैं। जब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग तेज हुई थी, तब दिग्विजय सिंह गुट भी एक्टिव हो गया था। और नए दावेदार सामने आने लगे थे। ऐसे भी कहा जाता है कि कमलनाथ की सरकार में दिग्विजय सिंह का हस्तक्षेप बहुत है। एक बार तो वन मंत्री उमंग सिंघार ने खुलकर कह दिया था कि पर्दे के पीछे से सरकार दिग्विजय सिंह ही चला रहे हैं। कहा तो यह भी जाता है कि सिंधिया को जब पद देने की बात आती है कि दिग्विजय और कमलनाथ दोनों विरोध में खड़े हो जाते हैं।

मध्यप्रदेश में अप्रैल में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। जिसमें अभी दो बीजेपी के पास है और एक कांग्रेस के पास। कांग्रेस की सीट पर दिग्विजय सिंह काबिज हैं। बदले हालात में इस बार दो सीटें कांग्रेस के खाते में जा सकती है। सिंधिया के समर्थक चाहते हैं कि उन्हें राज्यसभा भेज दिया जाए। अगर दूसरी सीट पर बीजेपी नहीं लड़ती है तब तो वो कांग्रेस के खाते में चली जाएगी। अगर नहीं गई तो या तो दिग्विजय सिंह जाएंगे या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया। अगर सीएम कमलनाथ कोई अपनी पसंद थोपते हैं तो फिर दोनों का पता कट सकता है। मगर अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है। ऐसे में लोग यह भी कह रहे हैं कि शायद सिंधिया प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे हो।

इन विवादों पर अब शांत रहने वाले सीएम कमलनाथ ने इस बार बहुत ही तल्ख लहजे में जवाब दिया है। क्योंकि ऐसे बयानबाजियों से सरकार की छवि खराब हो रही है। साथ ही अटकलों का दौर भी शुरू हो जाता है। ऐसे में अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी है कि आखिरी एमपी कांग्रेस का अगला बॉस कौन होगा। नाम की घोषणा के बाद ही यह तय होगा कि कांग्रेस में कलह खत्म होगी या नहीं।

Dailyhunt
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