चंडीगढ़: पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर चर्चा में है। पार्टी के पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल के चंडीगढ़ दौरे के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की दूरी ने सियासी अटकलों को और तेज कर दिया है।
एयरपोर्ट पर जहां पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने बघेल का स्वागत किया, वहीं चन्नी स्वयं वहां नहीं पहुंचे। इससे पार्टी के भीतर चल रहे मतभेद एक बार फिर सार्वजनिक रूप से सामने आ गए।
भूपेश बघेल के स्वागत के लिए चन्नी की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए। हालांकि, चन्नी गुट की ओर से पूर्व उपमुख्यमंत्री ओपी सोनी एयरपोर्ट पहुंचे, लेकिन उनके करीबी नेताओं तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और सुखबिंदर सिंह सुख सरकारिया भी स्वागत कार्यक्रम में नजर नहीं आए। इससे यह संकेत मिला कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष अभी भी बना हुआ है।
सूत्रों के अनुसार, चरणजीत सिंह चन्नी ने पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल के साथ होने वाली बैठक से भी दूरी बनाई। इससे पहले उन्होंने मोहाली में अपने समर्थक नेताओं के साथ अलग बैठक की थी। यह भी जानकारी सामने आई है कि उनके गुट के कुछ वरिष्ठ नेता दिल्ली पहुंचे हैं, जिससे संगठनात्मक बदलाव की चर्चाओं को और बल मिला है।
चन्नी समर्थक नेताओं का कहना है कि वे अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं करते। गुट की ओर से मांग की जा रही है कि चरणजीत सिंह चन्नी को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जाए और प्रदेश संगठन की कमान भी उन्हें सौंपी जाए। इस मांग ने पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
दूसरी ओर, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वह मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं हैं। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता केवल आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पार्टी नेतृत्व चरणजीत सिंह चन्नी या किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाता है तो उन्हें उस पर कोई आपत्ति नहीं होगी।
पंजाब विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास कायम करना है। यदि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद जारी रहते हैं, तो इसका असर चुनावी रणनीति और प्रदर्शन दोनों पर पड़ सकता है। अब सभी की नजरें पार्टी हाईकमान और पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल की आगामी रणनीति पर टिकी हैं।

