नदी केवल पानी बहाने वाली धारा नहीं है, बल्कि वह संस्कृति और प्रकृति को जोड़ने वाला जीवनदायी प्रवाह है. नदी जीवन, संस्कृति और सभ्यता का आधार है.
यदि नदियां सूख जाती हैं, तो उसके साथ संस्कृति और सभ्यता का भी पतन होता है, ऐसे विचार प्रख्यात जल विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र सिंह ने व्यक्त किए. वे मराठी में अनुदित पुस्तक पुनर्जीवित नदी 'बद्दह' के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे. डॉ. राजेंद्र सिंह द्वारा हिंदी में लिखित इस पुस्तक का मराठी में अनुवाद रीटा रॉड्रिग्स द्वारा किया गया है.
छत्रपति शाहू महाराज अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं मानव विकास संस्था (सारथी) के सभागार में शनिवार (4 जुलाई) को यह कार्यक्रम एमआईटी वेिशप्रयाग वेिशविद्यालय द्वारा आयोजित किया गया. इस अवसर पर वरिष्ठ पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र शेंडे, वरिष्ठ समाजसेवी जयाजी पाईकराव, एमआईटी वेिशप्रयाग वेिशविद्यालय की कार्याध्यक्षा प्रो. स्वाति कराड चाटे एवं संस्थापक कुलगुरु प्रो.
गोपालकृष्ण जोशी की उपस्थिति में पुस्तक का लोकार्पण किया गया. यह समारोह माईर्स एमआयटी शिक्षा समूह के संस्थापक अध्यक्ष आदरणीय प्रो. डॉ. वेिशनाथ डी. कराड के आशीर्वाद से संपन्न हुआ.
कार्यक्रम में स्ट्रैटेजी एवं ऑपरेशंस के निदेशक राघवेंद्र एम. चाटे, कुलसचिव प्राणेश मुरनाल सहित शिक्षा, समाज, उद्योग, जल संरक्षण एवं पर्यावरण क्षेत्र के अनेक विशेषज्ञ उपस्थित थे. डॉ. राजेंद्र शेंडे ने कहा, पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों अथवा अंतरराष्ट्रीय समझौतों से संभव नहीं है.
यह परिवर्तन वेिशविद्यालयों, युवाओं और समाज की सक्रिय भागीदारी से ही संभव होगा.मुख्य अतिथियों का स्वागत प्रो. स्वाती कराड चाटे ने किया. उन्होंने वेिशविद्यालय द्वारा सतत विकास, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, जल संरक्षण और सामाजिक सहभागिता के मूल्यों पर आधारित विभिन्न पहलों की जानकारी दी. कुलपति प्रो.
गोपालकृष्ण जोशी ने प्रस्तावना रखी. आभार प्रदर्शन प्रोजेक्ट डायरेक्टर प्रो. प्रभा कासलीवाल ने किया.

