Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
माओवादियों के निशाने पर अब छात्र आंदोलन

माओवादियों के निशाने पर अब छात्र आंदोलन

पुणे, 22 अगस्त 2026 संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को नष्ट करने के लिए माओवादियों ने अब तक किसानों, मजदूरों और आदिवासियों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। हालांकि, जब ये वर्ग उनसे दूर होने लगे, तो अब माओवादियों ने अपना ध्यान छात्र आंदोलनों की ओर मोड़ लिया है और समाज को समय रहते इस बारे में सतर्क होने की आवश्यकता है।

यह गंभीर चेतावनी नक्सलवाद के शोधकर्ता और बस्तर के भूमिपुत्र राजीव रंजन प्रसाद ने दी। वे पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के 'देवर्षि नारद माध्यम पुरस्कार' समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। फर्ग्यूसन कॉलेज के एम्फीथिएटर में वीएसके पुणे फाउंडेशन के विश्व संवाद केंद्र और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी (डीईएस) की ओर से यह पुरस्कार प्रदान किए गए। 'महाराष्ट्र टाइम्स' के पुणे संस्करण के संपादक श्रीधर लोणी को 'वरिष्ठ पत्रकार पुरस्कार', जबकि 'सकाल' के विशेष संवाददाता मयूरेश प्रभुणे और 'प्रभात' की वरिष्ठ संवाददाता अंजली खमितकर को 'आशाजनक पत्रकारिता पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।

वहीं, सोशल मीडिया श्रेणी में मोनेश शेलार को सम्मानित किया गया। इसी समारोह में पुणे श्रमिक पत्रकार संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष उमेश शेळके और पुणे पत्रकार प्रतिष्ठान के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राजेंद्र पाटिल का भी विशेष नागरिक सम्मान किया गया। मंच पर वीएसके के अध्यक्ष अभय कुलकर्णी, डीईएस के उपाध्यक्ष एडवोकेट अशोक पलांडे और सचिव आनंद काटीकर उपस्थित थे। नक्सलवाद के दर्दनाक अनुभवों को साझा करते हुए राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि माओवादी विचारधारा लोकतांत्रिक तरीकों से कभी सत्ता में नहीं आ सकती।

इसलिए वे बंदूक की नोक पर सत्ता हासिल करने की कोशिश करते हैं। बस्तर में नक्सलियों ने आदिवासियों पर अमानवीय अत्याचार किए, उन्हें विकास से दूर रखा और उनकी मूल संस्कृति को नष्ट कर दिया। हालांकि जंगल का नक्सलवाद 50 वर्षों के बाद आज कम हुआ है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में 'शहरी नक्सलवाद' (दिमागी नक्सलवाद) एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। किसानों और आदिवासियों को माओवादियों का असली चेहरा समझ में आ चुका है, इसलिए उन्होंने इस आंदोलन को खारिज कर दिया है।

लिहाजा, अब अपने आंदोलन को जीवित रखने के लिए छात्रों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे इतिहास की वास्तविकताओं के आधार पर अपनी विचारधारा और रुख का पुनर्मूल्यांकन करें। पुरस्कार स्वीकार करने के बाद अपने विचार व्यक्त करते हुए श्रीधर लोणी ने कहा, "आज सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अत्यधिक ध्रुवीकरण हो गया है। एक सुविधाजनक धारणा फैल गई है कि पत्रकार तभी निष्पक्ष माना जाता है जब वह हमारी विचारधारा का हो।

लेकिन एक पत्रकार को किसी भी गुट में शामिल हुए बिना आम जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। देश ने भले ही आर्थिक प्रगति की हो, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप, आय बढ़ने के बावजूद आम आदमी का जीवन आसान नहीं हुआ है।अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए अंजली खमितकर ने कहा कि पत्रकारिता की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने कई बदलाव देखे हैं। लगन और साहस से काम करने के कारण ही वह अपने सुरक्षित घेरे से बाहर निकल सकीं।

डिजिटल युग में भी उनका प्रिंट मीडिया पर विश्वास अडिग है, क्योंकि यदि चुनौतियों का सामना करने की क्षमता हो, तो माध्यम चाहे जो भी हो, काम किया जा सकता है। मयूरेश प्रभुणे ने खेद व्यक्त करते हुए कहा, "समाज की तरह मीडिया में भी विज्ञान को मुख्यधारा में स्थान नहीं मिल पाता है। जिस दिन विज्ञान पत्रकारिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण मुख्यधारा में आएंगे, उसी दिन भारतीय समाज सही अर्थों में समृद्ध होगा।" सोशल मीडिया की चुनौतियों पर बोलते हुए मोनेश शेलार ने कहा कि वर्तमान में इतिहास और वर्तमान पर विभिन्न विचारधाराओं की भारी बौछार हो रही है। इस अराजकता से सच को बाहर निकालकर समाज के सामने निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करना आज के डिजिटल मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। प्रस्तावना में अभय कुलकर्णी ने स्पष्ट किया कि विश्व संवाद केंद्र इस ध्येय के साथ काम कर रहा है कि पत्रकारिता और मीडिया के केंद्र में 'राष्ट्रीयता' होनी चाहिए। वहीं, एडवोकेट अशोक पलांडे ने विचार व्यक्त किया कि सूचना की भारी गति के बीच पाठकों तक सटीक और सत्य जानकारी पहुंचाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। कार्यक्रम का संचालन वसुंधरा काशिकर ने किया, जबकि आनंद काटीकर ने उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Aaj Ka Anand