सेना के तीनो दलों में तालमेल बना रहे, इसलिए 'थियेटराइजेशन' (एकीकृत कमान प्रणाली) आवश्यक है. थियेटराइजेशन पर सभी आवश्यक चर्चाएं चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी) के भीतर पूरी हुई हैं.
इसकी संपूर्ण रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय को सौंप दी गई है, और वर्तमान में इसकी समीक्षा की जा रही है. इसके तहत तीनों सेनाओं के मुख्य हितों को पूरी तरह ध्यान में रखा जाएगा. यह जानकारी सेनाप्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने दी. खड़कवासला स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के 150 वें कोर्स के पासिंग आउट परेड के बाद आयोजित पत्रकार-वार्ता में वे बोल रहे थे. उन्होंने कहां कि, थियेटराइजेशन के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) और तीनों सेना प्रमुखों (पूर्व प्रमुख सहित) ने बेहद स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाया है. तीनों सेनाओं के मुख्य हितों को पूरी तरह ध्यान में रखा जाए और निश्चित रूप से, जब भी हमें लगेगा कि कोई ऐसा तालमेल बैठाना जरूरी है, तो तीनों सेनाओं के बीच थोड़ा लेन और देन (गिव एन्ड टेक) का रवैया अपनाया जाएगा. जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि, थियेटराइजेशन के तहत, सेना प्रमुख मुख्य रूप से बल को खड़ा करने, प्रशिक्षित करने और उसे बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होंगे, जबकि थियेटर कमांडर उन बलों के संचालन और ऑपरेशन्स के लिए जिम्मेदार होंगे. हम पूरी तरह आशान्वित हैं कि नए सीडीएस के नेतृत्व में आने वाली अगली लीडरशिप इसको और आगे बढ़ाएगी, और अगले दो से तीन वर्षों में हम इसे जमीन पर उतरते हुए या अंतिम रूप लेते हुए देख सकेंगे. ऑपरेशन सिंदूर के संबंध में उन्हौंने कहा कि, ऑपरेशन सिंदूरएक सुनियोजित रणनीति है. भारतीय सेना और तीनों सेनाएं ऑपरेशन सिंदूर 2.0 की तैयारियों के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं. वर्तमान में, हम तीनों सेनाओं के भीतर अपनी क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. अगला संघर्ष केवल थल, जल और नभ तक ही सीमित नहीं रहेगा. नए डोमेन यानी अंतरिक्ष, साइबर और संज्ञानात्मक युद्ध इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. समय के साथ हमने देखा है कि युद्धक्षेत्र अब 24 घंटे इतना पारदर्शी हो चुका है कि हर एक हलचल की खबर दूसरे पक्ष को तुरंत मिल जाती है. इसलिए, हमें अपनी सेना की तैनाती, उपयोग और अपने सैनिकों तथा नागरिक आबादी की सुरक्षा के संदर्भ में बहुत सतर्क रहना होगा. जहां तक सूचना युद्ध (इन्फॉरमेशन वॉरफेयर) का सवाल है, जीत हमेशा दिमाग से जीती जाती है, केवल जमीन पर नहीं. इसलिए, सूचना युद्ध केवल तभी सफल हो सकता है जब पूरा देश एकजुट हो और उन लोगों पर भरोसा करे जो उन्हें जानकारी प्रदान कर रहे हैं. अगर ऐसा होता है, तो मैं आपको वेिशास दिलाता हूं कि जो राष्ट्र आपस में और अपने सभी हितधारकों पर भरोसा रखता है, वह हमेशा विजयी होता है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) बारे में उन्होंने कहा कि, एआई आज की वास्तविकता है. एआई को हमें बहुत व्यावहारिक रूप से देखना होगा. जब युद्ध की गति बहुत तेज होती है, तब आपको अपने संसाधनों के भीतर तेजी से निर्णय लेने के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती है.ऐसी परिस्थितियों में एसएलएम और एलएलएम जैसे लैंग्वेज मॉडल्स बहुत काम आते हैं. ये प्लेटफॉर्म निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करते हैं. दुनिया में बड़ी संख्या में ड्रोन्स का इस्तेमाल हो रहा है. अब आपको एंटी- ड्रोन उपकरणों की भी जरूरत है और खुद के ड्रोन्स तैनात करने की भी जरूरत है. इसलिए युद्धक्षेत्र में संसाधन बहुत विशाल हो चुके ह्ैं. इतने बड़े पैमाने पर संसाधनों को प्रबंधित करने के लिए हमें ऑटोमेशन की आवश्यकता होती है, और यही वह जगह है जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेहद मददगार साबित हो रहा है.
एनडीए कैडेट्स लेंगे ड्रोन्स चलाने का प्रशिक्षणईगर आर्मी का मतलब हर जवान के हाथ में ईगर ड्रोन होना चाहिए. हर जवान को ड्रोन उड़ाने की काबिलियत होनी चाहिए.एनडीए के कमांडेंट से मैंने खुद बातचीत करके यहां पर ट्रेनिंग टीम को करीब 4 से 6 बड़े ड्रोन और सिमुलेटर दिये हैं. ड्रोन्स और काउंटर-ड्रोन इक्विपमेंट के बारे में जानकारी हर कैडेट को होनी बहुत जरूरी है,क्योंकि जब कैडेट यहां से जैसे ही लड़ाई के मैदान में जाएगा, वहां पर ड्रोन्स की बहुत बड़ी भूमिका होगी. इसलिए हम ड्रोन्स के बारे में हर कैडेट को जानकारी दे रहे हैं, सिमुलेटर्स के जरिए भी और लाइट ड्रोन्स के जरिए भी ट्रेनिंग दे रहे हैं.

