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युद्ध के चलते कई संकटों से जूझ रहा सर्राफा व्यवसाय

युद्ध के चलते कई संकटों से जूझ रहा सर्राफा व्यवसाय

रविवार पेठ, 3 अप्रैल (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

रान और इजराइल-अमेरिका के बीच चल रहे युद्धसमेत वर्तमान संकटों से सराफा व्यवसाय जूझ रहा है. खासकर चांदी के व्यवसायीयों में त्रासदी बढ़ी है.

यदि युद्ध की स्थिति लंबी चली और गैस की कमी बनी रही, तो कारीगर गांवों की ओर पलायन करेंगे और सराफा उद्योग पर स्थायी चोट पड़ेगी. चांदी के होलसेल व्यापार में 2003 से काम कर रहे सुनील (समीर) जैन ने ‌'आज का आनंद' से अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि जो समाज हर खुशी में दूसरों की समृद्धि का प्रतीक रहा, वही सोनार वर्ग आज संकट में है. जैन ने बताया कि कोविड के बाद से सराफा बाजार में लगातार तेजी बनी हुई है. जो चांदी कभी लगभग 36,000 रुपये प्रति किलो थी, आज 2.5 लाख रुपये के पार पहुंच चुकी है. सोने के दाम भी उसी रफ्तार से बढ़े हैं. कभी गरीबों का सोना कहे जाने वाली चांदी अब आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गई है. बच्चों के जन्मदिन से लेकर शादी, सगाई और हर शुभ अवसर पर दिया जाने वाला चांदी का उपहार अब महंगाई के कारण धीरे-धीरे दूसरी धातुओं और विदेशी सामानों में दिया जाने लगा है. परिणामस्वरूप, बिक्री लगभग ठप हो चुकी है. समीर जैन ने कहा कि आज बढ़ते भावों ने सराफा व्यापारी को लगभग खाली हाथ कर दिया है. काम नगण्य है, पर खर्चे यथावत - दुकान का किराया, स्टाफ की तनख्वाह, बैंक लोन की किश्तें, बिजली बिल, सुरक्षा खर्च और कारीगरों की मजदूरी आदी. ग्राहक आए या न आए, ये सब खर्चा देना ही है.साल 2026 आते-आते संकट और गहराया है. चांदी के दाम 1 लाख रुपये से बढ़कर 4 लाख रुपये के पार पहुंचे. व्यापारियों ने जो स्टॉक 1.5 या 2.5 लाख रुपये में बेचा, उसे अब महंगे दाम पर वापस खरीदना मुश्किल हो गया. नतीजा-स्टॉक खाली, कारीगरों के पास काम नहीं है. ऊपर से युद्ध की परिस्थितियों के कारण गैस की कमी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. जहां काम है वहां चांदी नहीं, और जहां चांदी है वहां काम रुक गया है. कई परिवारों में एक भाई इस व्यवसाय में है तो दूसरा किसी और काम की तलाश में है. समीर जैन ने प्रार्थना है कि सब कुछ जल्द सामान्य हो, वेिश में शांति स्थापित हो. अगर वैेिशक हालात नहीं सुधरे, तो इसका असर हमारे देश पर और गहरा होगा. सराफा व्यवसाय को मानो किसी की नजर लग गई है बढ़ते भाव और गैस की कमी ने बाजार को जकड़ लिया है.

छोटे-बड़े सभी व्यापारी त्रासदी से घिरे

इस उद्योग से जुड़े कुरियर, ट्रांसपोर्ट, चांदी गलाने वाले और हॉलमार्किंग/टंच सेंटर भी प्रभावित हैं. गैस न मिलने से भट्टियां बंद हैं, मशीनों की टक-टक थम गई है और कारीगर मोबाइल में समय काटते दिख रहे हैं. छोटे रिटेल दुकानदार और घूम-घूमकर माल बेचने वाले व्यापारी सबसे ज्यादा संकट में हैं. जो भी कलेक्शन होता है, वह किराया, वेतन और घर-खर्च में निकल जाता है. एक व्यापारी के लिए उसका असली पूंजी उसका स्टॉक है. तेजी या मंदी से परे उसे स्टॉक बनाए रखना ही पड़ता है. लेकिन अचानक आई तेजी में कम दाम का माल ऊंचे दाम पर बिक गया, और ऊंचे दाम पर वापस खरीद न पाने से स्टॉक घट गया. मुनाफा दिखा तो टैक्स भी बढ़ा, और नया माल खरीदना और कठिन हो गया. - सुनील (समीर) जैन, जवाई सिल्वर, रविवार पेठ, 9822079453

पूरे तंत्र के सामने कई सवाल, कई चुनौतियां

कारीगर, उत्पादक, सप्लायर, रिटेलर, ट्रांसपोर्ट-सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं, पर आज पूरा तंत्र संकट में है. अचानक बढ़े भावों के कारण कारीगरों को एडवांस में चांदी देने में भी डर है कि कहीं कारीगर भाग न जाए. भारत की प्रमुख चांदी मंडियां- आगरा, मथुरा, राजकोट, अहमदाबाद, जयपुर, कोल्हापुर, हुपरी और सेलम. जहां बड़े पैमाने पर चांदी के दागिने और बर्तन बनते हैं, वहां भी सन्नाटा है. कारीगर दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं. होलसेल व्यापारी तक भुगतान नहीं पहुंच पा रहा. बिना भुगतान नया माल कैसे बने..? ऊपर से स्टॉक बनाए रखने के लिए भारी पूंजी की जरूरत, बैंक लोन और उस पर ब्याज का बोझ-सब मिलकर स्थिति को और कठिन बना रहे हैं.

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