कांग्रेस नेता पवन खेड़ा से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील रखते हुए इसे अभूतपूर्व मामला बताया और कहा कि इसमें संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के बयानों को भी शामिल किया गया है।
सिंघवी ने हिमंत बिस्वा सरमा के बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि वे इतने आपत्तिजनक हैं कि उन्हें अदालत में पढ़ा भी नहीं जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि खेड़ा को धमकी दी गई कि उन्हें पूरी जिंदगी असम की जेल में बितानी पड़ेगी।
'गिरफ्तारी की क्या जरूरत?' सिंघवी
सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि यह मामला मुख्य रूप से मानहानि से जुड़ा है और इसमें गिरफ्तारी या हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि अधिकांश धाराएं जमानती हैं और बिना गिरफ्तारी के भी जांच पूरी की जा सकती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि खेड़ा की गिरफ्तारी के लिए असम पुलिस के बड़ी संख्या में जवान पहुंचे, जैसे किसी गंभीर अपराधी को पकड़ने की कार्रवाई हो रही हो।
हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल
वरिष्ठ वकील ने हाई कोर्ट के आदेश पर भी आपत्ति जताई, जिसमें BNS की धारा 339 का उल्लेख किया गया है। उनका कहना था कि यह धारा न तो शिकायत में है और न ही FIR में दर्ज है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह भी एक जमानती अपराध है। वहीं, असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह साधारण मानहानि का मामला नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि खेड़ा ने मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई देशों के पासपोर्ट होने का दावा किया और कथित दस्तावेज भी दिखाए, जो जांच में नकली पाए गए।
'विदेशी साजिश की भी जांच जरूरी'
मेहता ने कहा कि इस मामले में हिरासत में पूछताछ जरूरी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये कथित फर्जी दस्तावेज कहां से आए और क्या इसके पीछे कोई विदेशी साजिश है। उन्होंने कहा कि जांच से जुड़ी सभी जानकारी फिलहाल सार्वजनिक नहीं की जा सकती। खेड़ा मामले में अदालत में सुनवाई के दौरान कानूनी और राजनीतिक दोनों पहलू उभरकर सामने आए हैं। अब इस मामले में अदालत के फैसले पर सबकी नजर टिकी है, जो आगे की दिशा तय करेगा।

