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Janmashtami 2026: आधी रात को ही क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्मोत्सव? जानें पूजा मुहूर्त और पारण के नियम

Janmashtami 2026: आधी रात को ही क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्मोत्सव? जानें पूजा मुहूर्त और पारण के नियम

Janmashtami 2026 Puja Timming: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व कृष्ण जन्माष्टमी 2026 में शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाया जाएगा. हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है.

इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और आधी रात को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाकर पूजा-अर्चना करते हैं.

नई दिल्ली में निशिता पूजा मुहूर्त रात 11:57 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:43 बजे तक रहेगा. इस दौरान भक्त भगवान कृष्ण को भोग अर्पित कर आरती, प्रार्थना और भजन-कीर्तन करते हैं.

जन्माष्टमी 2026 की मेन तारीखें

जन्माष्टमी: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
दही हांडी: शनिवार, 5 सितंबर 2026
श्रीकृष्ण की जन्म जयंती: 5253वीं जन्म जयंती

हालांकि मुख्य पर्व 4 सितंबर को है, लेकिन आधी रात में होने वाले जन्मोत्सव के कारण पूजा और कुछ धार्मिक अनुष्ठान 5 सितंबर तक जारी रहेंगे.

आधी रात को ही क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्मोत्सव?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में आधी रात को हुआ था. उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव को राजा कंस ने बंदी बना रखा था. कंस को भविष्यवाणी का भय था कि देवकी की आठवीं संतान उसके अंत का कारण बनेगी.

श्रीकृष्ण के जन्म के बाद वसुदेव उन्हें यमुना पार कर गोकुल ले गए, जहां उनका पालन-पोषण नंद और यशोदा ने किया. इसी वजह से भक्त आधी रात तक प्रतीक्षा करते हैं और जन्म के समय शंख, घंटियां, भजन तथा जयकारों के साथ उत्सव मनाते हैं.

जन्माष्टमी 2026 पूजा मुहूर्त

जन्माष्टमी का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान निशिता काल पूजा है. इसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय से संबंधित माना जाता है. भक्त इसी अवधि में बाल गोपाल का अभिषेक कर नए वस्त्र पहनाते हैं और माखन-मिश्री सहित विभिन्न भोग अर्पित करते हैं.

व्रत और पारण के नियम

जन्माष्टमी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आधी रात तक व्रत रखते हैं. अपनी स्वास्थ्य स्थिति, पारिवारिक परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार कोई फल, दूध और व्रत में खाए जाने वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण करता है, जबकि कुछ भक्त निर्जला या कठोर उपवास भी रखते हैं.

पारण का अर्थ व्रत खोलना है. कई परंपराओं में मध्यरात्रि जन्मोत्सव के बाद व्रत खोला जाता है, जबकि धर्मशास्त्र आधारित गणनाओं में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र की स्थिति के अनुसार पारण का समय बाद में भी हो सकता है.

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