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दल बदल पर Supreme Court ने की गंभीर टिप्पणी

National News- बची रहे लोकतंत्र की गरिमा
देश की सर्वोच्च अदालत ने संसद का ध्यान अत्यंत आवश्यक एवं गंभीर विषय की ओर आकर्षित किया है। मणिपुर में दलबदल संबंधी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने संसद से कहा है कि वह दलबदल कानून के तहत सांसद-विधायकों के अयोग्यता संबंधी निर्णय सदन के अध्यक्ष के पास ही रखने के प्रावधान पर पुनर्विचार करे।


सर्वोच्च न्यायालय की यह पीठ दलबदल संबंधी जिस मामले में विधायक को अयोग्य ठहराने की याचिका पर सुनवाई कर रही है, वह पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर का है। टी श्याम कुमार ने मणिपुर विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और जीता, लेकिन फिर वह भाजपा में शामिल होकर मंत्री बन गये। कांग्रेस ने उन्हें अयोग्य घोषित करने की याचिका मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दायर की।

विधानसभा अध्यक्ष द्वारा सुनवाई-कार्रवाई में विलंब होता देख कांग्रेस विधायकों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष को चार सप्ताह में निर्णय करने का निर्देश देते हुए वैसा न होने पर याचियों को पुन: अपने पास आने को कहा है, लेकिन साथ ही इस देशव्यापी समस्या के समाधान के लिए संसद से मौजूदा व्यवस्था पर पुनर्विचार के लिए भी कहा है।

मौजूदा प्रावधानों के मुताबिक सांसद या विधायक द्वारा दलबदल पर उसको अयोग्य ठहराये जाने के लिए संबंधित सदन के अध्यक्ष के समक्ष ही याचिका दायर की जाती है, जिस पर निर्णय के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है। यह पूर्णत: अध्यक्ष के विवेक और विशेषाधिकार का मामला है कि वह कब और क्या फैसला करे। परिणाम यह होता है कि कई मामलों में तो सदन का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद ही फैसला आता है, जो संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दलबदल कानून के प्रावधानों और लोकतंत्र का मखौल उड़ाने जैसा है।

स्पीकर के उच्च गरिमामय पद पर आसीन व्यक्ति भी क्यों ऐसा करते हैं, इसकी ओर भी सर्वोच्च न्यायालय ने इशारा किया है। न्यायमूर्ति नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा है, क्योंकि अध्यक्ष मूलत: किसी राजनीतिक दल से ही संबद्ध होता है, इसलिए उसकी भूमिका और निर्णय निष्पक्ष नहीं हो पाते। संसद से लेकर विधानसभाओं तक ऐसी मिसालों की कमी भी नहीं है, जो सर्वोच्च न्यायालय की इस आशंका की पुष्टि करती हैं। जरा हरियाणा का मामला याद कर लीजिए।

वर्ष 2009 के विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से छह सीटें कम यानी 40 पर सिमट गयी थी। तब हरियाणा जनहित कांग्रेस के विधायकों को तोड़ कर तथा कुछ निर्दलीयों को जोड़ कर सरकार बनायी गयी थी। तब हजकां ने दलबदलू विधायकों को अयोग्य घोषित करवाने के लिए स्पीकर के समक्ष याचिका दायर की थी, जिसका फैसला उस विधानसभा और सरकार का कार्यकाल पूरा होने पर ही आ पाया।

ऐसा ही कारनामा कभी उत्तर प्रदेश विधानसभा के स्पीकर ने किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि दोनों ही स्पीकर अलग-अलग दलों से संबद्ध थे, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि अक्सर स्पीकर बन जाने के बाद भी माननीय दलगत प्रतिबद्धता और संकीर्ण सोच से नहीं उबर पाते। ऐसे उदाहरणों की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, लेकिन जरूरत संसदीय लोकतंत्र को दीमक तरह खोखला कर रही इस प्रवृत्ति को समाप्त करने की है। इस बाबत फैसला तो संसद को ही करना है, पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहतर सुझाव अवश्य दिया है कि दलबदलू सांसद-विधायकों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निष्पक्ष सुनवाई और त्वरित निपटारे के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में प्राधिकरण अथवा ऐसी कोई अन्य स्वतंत्र स्थायी व्यवस्था की जाये। सत्ता और स्वार्थ केंद्रित राजनीति में बेलगाम दलबदल प्रवृत्ति पर अंकुश के लिए भी जरूरी है कि ऐसे मामलों के निष्पक्ष एवं त्वरित निपटारे के लिए कोई विश्वसनीय एवं कारगर व्यवस्था बने।


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Dailyhunt
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