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क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण या बरकरार रहेगा दीदी का किला?

क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण या बरकरार रहेगा दीदी का किला?

(पवन वर्मा - विनायक फीचर्स)

West Bengal की राजनीति में "खेला होबे" केवल एक नारा नहीं, बल्कि चुनावी माहौल की पहचान बन चुका है। 2026 का विधानसभा चुनाव भी इसी जोश, राजनीतिक टकराव और जनभावनाओं के बीच संपन्न हुआ।

मतदान खत्म होते ही अब पूरे देश की नजरें एग्जिट पोल्स पर टिक गई हैं, जो बंगाल की अगली सरकार को लेकर अलग-अलग संकेत दे रहे हैं।

इस चुनाव को केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाले निर्णायक मुकाबले के तौर पर माना जा रहा है। एक ओर Narendra Modi के नेतृत्व में भाजपा "परिवर्तन" और "नए बंगाल" का सपना लेकर मैदान में उतरी, तो दूसरी तरफ Mamata Banerjee ने क्षेत्रीय अस्मिता और "मां-माटी-मानुष" के मुद्दे को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा।

भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और केंद्र सरकार की योजनाओं को प्रमुख हथियार बनाया। पार्टी ने बंगाल को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ने और प्रशासनिक बदलाव लाने का वादा किया।भाजपा की चुनावी सभाओं में उमड़ी भीड़ ने यह संकेत जरूर दिया कि राज्य का एक बड़ा वर्ग बदलाव की संभावना तलाश रहा है। पार्टी ने भ्रष्टाचार, शासन व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने पूरे चुनाव अभियान को ममता बनर्जी की राजनीतिक छवि और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के इर्द-गिर्द केंद्रित रखा। ममता बनर्जी ने खुद को बंगाल की आवाज और बाहरी राजनीतिक प्रभाव के खिलाफ संघर्ष करने वाली नेता के रूप में पेश किया। उनके भाषणों में क्षेत्रीय गौरव, सामाजिक संतुलन और कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख लगातार दिखाई दिया।टीएमसी का भरोसा ग्रामीण इलाकों, महिला मतदाताओं और स्थानीय संगठनात्मक नेटवर्क पर टिका रहा।

इस बार बंगाल में भारी मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों की उत्सुकता और बढ़ा दी है। बड़ी संख्या में युवाओं, महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं की भागीदारी ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल का "मौन मतदाता" अक्सर अंतिम नतीजों में बड़ा उलटफेर कर देता है। यही कारण है कि एग्जिट पोल्स आने के बाद भी तस्वीर पूरी तरह साफ नजर नहीं आ रही।

विभिन्न सर्वे एजेंसियों और न्यूज चैनलों द्वारा जारी एग्जिट पोल्स में अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। कई सर्वे भाजपा को मजबूत बढ़त या बहुमत के करीब दिखा रहे हैं, जबकि कुछ एजेंसियां तृणमूल कांग्रेस को अब भी मजबूत स्थिति में मान रही हैं। अनुमानों के मुताबिक भाजपा 95 से 208 सीटों तक पहुंच सकती है, जबकि टीएमसी को 85 से 189 सीटों के बीच दिखाया जा रहा है। इन आंकड़ों ने मुकाबले को बेहद रोमांचक बना दिया है।

हालांकि एग्जिट पोल्स केवल अनुमान होते हैं और अंतिम फैसला मतगणना के दिन ही सामने आएगा। लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह दो ध्रुवों में बंट चुकी है, जहां मुकाबला सीधा भाजपा और टीएमसी के बीच सिमटता नजर आ रहा है।

West Bengal का यह चुनाव केवल सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा और भविष्य की प्राथमिकताओं को तय करने वाला चुनाव माना जा रहा है। अब सभी की नजरें मतगणना पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि बंगाल "परिवर्तन" चुनता है या "मां-माटी-मानुष" पर फिर भरोसा जताता है।

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