भारतीय लोकजीवन में ऋतुओं के अनुसार खान-पान और दिनचर्या को लेकर अनेक लोकोक्तियाँ प्रचलित हैं। इनमें से एक प्रसिद्ध कहावत है-
"चैते गुड़ बैसाखे तेल,
जेठे पथ्य असाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही,
क्वार करेला न कार्तिक मही।।
अगहन जीरा पूसे घना,
माघे मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय,
वहिं घर वैद कबौं न जाय।।"
यह लोकोक्ति ऋतुओं के अनुसार कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन में सावधानी बरतने की सलाह देती है। आयुर्वेद में भी ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार आहार-विहार) को स्वस्थ जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।
आयुर्वेद के अनुसार वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित किया गया है और प्रत्येक ऋतु में शरीर के वात, पित्त और कफ दोषों में परिवर्तन होता है। इन्हीं परिवर्तनों के अनुसार भोजन और जीवनशैली में बदलाव की सलाह दी जाती है।
कई आधुनिक अध्ययन भी यह संकेत देते हैं कि मौसम के अनुसार खान-पान बदलना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है।
हालांकि यह लोकोक्ति भारतीय पारंपरिक ज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसके सभी निष्कर्ष आधुनिक वैज्ञानिक शोधों द्वारा सार्वभौमिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं। उदाहरण के लिए, करेला, जीरा, चना या मिश्री जैसे खाद्य पदार्थों को किसी विशेष महीने में पूरी तरह वर्जित करने के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इनका सेवन व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, पाचन क्षमता और चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार तय किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, ऋतुचर्या का मूल उद्देश्य किसी खाद्य पदार्थ का पूर्ण निषेध नहीं, बल्कि मौसम, शरीर की प्रकृति और पाचन क्षमता के अनुसार संतुलित एवं विवेकपूर्ण आहार अपनाना है।
- प्रो. अविनाश चन्द्र श्रीवास्तव
प्राचार्य, गोयल आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज, लखनऊ

