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एक हसरत जो रह गई अधूरी, इस एक्ट्रेस को डायरेक्ट करना चाहते थे रितुपर्णो घोष

एक हसरत जो रह गई अधूरी, इस एक्ट्रेस को डायरेक्ट करना चाहते थे रितुपर्णो घोष

मुंबई, 30 अगस्त (आईएएनएस)। फिल्मकार रितुपर्णो घोष ने पर्दे पर रिश्तों की उन परतों को दिखाया, जिन्हें अक्सर बड़ी-बड़ी कहानियों के बीच नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनके किरदारों में प्यार, अकेलापन, उलझन और जिंदगी को समझने की कोशिश होती थी।

अपने लंबे करियर में उन्होंने कई बड़े सितारों के साथ काम किया और हर कलाकार को एक अलग अंदाज में पेश किया, लेकिन इतने सफल सफर के बावजूद उनकी एक चाहत ऐसी थी, जो पूरी नहीं हो सकी।

यह ख्वाहिश बॉलीवुड की उस अभिनेत्री से जुड़ी थी, जिसे वह लंबे समय से अपनी फिल्म में एक अलग रूप में दिखाना चाहते थे। वक्त बीतता गया, कई फिल्में बनीं, कई सितारे उनके कैमरे के सामने आए, लेकिन यह सपना आखिरकार सपना ही रह गया।

रितुपर्णो घोष का जन्म 31 अगस्त 1963 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता सुनील घोष डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर और पेंटर थे। घर में ही उन्हें कला और सिनेमा का माहौल मिला। बचपन से ही फिल्मों और किताबों में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी। हालांकि, उन्होंने सीधे फिल्ममेकिंग की पढ़ाई नहीं की। उन्होंने जादवपुर यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की और इसके बाद विज्ञापन की दुनिया में कदम रखा।

फिल्मों में आने से पहले रितुपर्णो घोष करीब एक दशक तक विज्ञापन की दुनिया से जुड़े रहे। यहां उन्होंने कॉपीराइटर के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने कम शब्दों में कहानी को असरदार तरीके से पेश करने का हुनर सीखा। यही अनुभव बाद में उनकी फिल्मों में भी नजर आया। वह छोटी-छोटी भावनाओं पर भी काफी ध्यान देते थे।

बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म 'हीरेर अंगटी' थी, जो बच्चों की कहानी पर आधारित थी। लेकिन उन्हें असली पहचान 1994 में आई फिल्म 'उनीशे अप्रैल' से मिली। मां-बेटी के रिश्ते पर बनी इस फिल्म ने दर्शकों को भावुक कर दिया। फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म मिला और रितुपर्णो घोष का नाम बंगाली सिनेमा के प्रमुख निर्देशकों में शामिल हो गया।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक ऐसी फिल्में बनाईं, जिनमें रिश्ते, प्यार, अकेलापन, परिवार और समाज के दबाव जैसे विषय नजर आए। 'दहन', 'बारीवाली', 'उत्सव', 'तितली', 'शुभो महूरत', 'चोखेर बाली', 'दोसर', 'आबोहोमान' जैसी फिल्मों ने उनकी अलग पहचान बनाई। वह खास तौर पर महिला किरदारों को बहुत गहराई से दिखाने के लिए जाने गए।

रितुपर्णो घोष ने हिंदी सिनेमा में भी अपनी खास जगह बनाई। 'चोखेर बाली' में ऐश्वर्या राय के साथ काम करने के बाद उन्होंने हिंदी में 'रेनकोट' बनाई, जिसमें ऐश्वर्या राय और अजय देवगन नजर आए। इसके बाद उन्होंने अमिताभ बच्चन, प्रीति जिंटा और अर्जुन रामपाल के साथ अंग्रेजी फिल्म 'द लास्ट लीयर' बनाई। उनकी फिल्मों में बड़े सितारे जरूर होते थे, लेकिन कहानी और किरदार हमेशा सबसे ऊपर रहते थे।

इसी दौरान रितुपर्णो माधुरी दीक्षित को डायरेक्ट करना चाहते थे। रितुपर्णो ने अपने एक इंटरव्यू में इस इच्छा का जिक्र किया था। उनके लिए माधुरी सिर्फ एक बड़ी स्टार नहीं थीं, बल्कि ऐसी अभिनेत्री थीं जिनके भीतर भावनाओं को पर्दे पर उतारने की जबरदस्त क्षमता थी। वह उनके साथ ऐसी कहानी बनाना चाहते थे, जिसमें माधुरी को एक अलग और गंभीर अंदाज में दिखाया जा सके, लेकिन वक्त ने उन्हें यह मौका नहीं दिया। माधुरी के साथ काम करने का उनका सपना उनकी जिंदगी के अधूरे सपनों में शामिल रह गया।

रितुपर्णो घोष का सिनेमा सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था। उन्होंने खुद भी अभिनय किया और टेलीविजन पर होस्ट के तौर पर नजर आए। उनकी फिल्म 'चित्रांगदा' उनके सबसे निजी कामों में गिनी जाती है। इसमें उन्होंने खुद अभिनय भी किया था और जेंडर पहचान जैसे संवेदनशील विषय को कहानी के केंद्र में रखा।

अपने करियर में रितुपर्णो घोष को 12 नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिले। उनकी फिल्मों को देश ही नहीं, विदेशों में भी सम्मान मिला। उन्होंने बंगाली सिनेमा को ऐसी कहानियां दीं, जिनमें बड़े एक्शन या भारी-भरकम सेट की जगह इंसानी रिश्ते और भावनाएं सबसे महत्वपूर्ण थीं। य

रितुपर्णो घोष का 30 मई 2013 को 49 साल की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया।

--आईएएनएस

पीके/डीकेपी

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