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'नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड' पर यूनेस्को हाउस में मंथन, लेखक अभय के. ने बताया कैसे नालंदा से बदली दुनिया

'नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड' पर यूनेस्को हाउस में मंथन, लेखक अभय के. ने बताया कैसे नालंदा से बदली दुनिया

ई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की ओर से भारत में लेखक और राजनयिक अभय के. की पुस्तक 'नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड' पर एक विशेष कार्यक्रम 'कॉन्वर्सेशंस ऑन नालंदा' यूनेस्को हाउस में आयोजित किया गया।

इस मौके पर दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को प्रमुख टिम कर्टिस ने भारत के अजरबैजान में राजदूत अभय के., नालंदा विश्वविद्यालय के भाषा एवं साहित्य विद्यालय के प्रोफेसर डी. वेंकट राव और हमारे रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रीस्नर का हार्दिक स्वागत क‍िया। इस चर्चा में राजनयिकों, शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और छात्रों ने भाग लिया और प्राचीन शिक्षा केंद्र नालंदा तथा उसकी वैश्विक विरासत पर विचार साझा किए।

चर्चा के दौरान अभय के. ने बताया कि नालंदा की शैक्षणिक परंपरा बहुत व्यापक थी। यहां खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, दर्शन और कविता जैसे अनेक विषयों का अध्ययन और शोध किया जाता था।

उन्होंने बताया कि नालंदा की शिक्षा प्रणाली बहुविषयक (इंटरडिसिप्लिनरी) थी, यहां विविध पृष्ठभूमि के विद्वान अध्यापक थे और योग्यता के आधार पर छात्रवृत्तियां दी जाती थीं। उनके अनुसार, ये विशेषताएं आज की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती हैं।

चर्चा के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय के आधुनिक पुनर्जीवन और भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में उसकी नई भूमिका पर भी ध्यान दिया गया। राजगीर में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2024 में किया था। इसे प्राचीन नालंदा की विरासत को फिर से स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।

दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को प्रमुख टिम कर्टिस ने कहा, "मैं संयुक्त राष्ट्र रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर कार्यालय का विशेष धन्यवाद करना चाहता हूं, जिसने इस कार्यक्रम का आयोजन यूनेस्को के साथ मिलकर किया।"

दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को प्रमुख टिम कर्टिस ने कहा क‍ि यूनेस्को कई क्षेत्रों में काम करता है, जिनमें विश्व धरोहर (वर्ल्ड हेरिटेज) भी शामिल है। नालंदा एक विश्व धरोहर स्थल है। भारत की सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध है और देश में 45 विश्व धरोहर स्थल हैं। यह विरासत संरक्षण के प्रति लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्‍होंने कहा क‍ि जब नालंदा को सूची में शामिल किया गया तो उसे उसके 'असाधारण सार्वभौमिक महत्व' के आधार पर मान्यता दी गई। यह मान्यता दो प्रमुख मानदंडों पर आधारित थी।

पहला है 'मानदंड 4': नालंदा ने संस्थानों की स्थापना, स्थल नियोजन, वास्तुकला और कलात्मक परंपराओं के ऐसे सिद्धांत स्थापित किए, जिनमें विशेष रूप से चौकोर विहार संरचना, पंचबिंदु शैली वाले चैत्य, स्टुको कला और धातु कला शामिल हैं। इन परंपराओं को बाद में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई समान संस्थानों ने अपनाया। इसका मतलब है कि नालंदा केवल अपने समय का एक अनोखा केंद्र नहीं था, बल्कि इसने पूरे क्षेत्र की वास्तुकला और शैक्षणिक परंपराओं को प्रभावित किया।

दूसरा है 'मानदंड 6': नालंदा महाविहार उस उच्चतम चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जहां एक मठवासी संस्था विकसित होकर विश्वविद्यालय बनी। इसने बौद्ध धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र और ज्ञान-विमर्श की परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही, बहस और गुरु-शिष्य परंपरा जैसी विशिष्ट शिक्षण पद्धतियों को भी बढ़ावा दिया। इसकी निरंतरता आज भी दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई मठों में देखी जा सकती है।

असाधारण सार्वभौमिक महत्व के इस बयान में यह भी कहा गया है कि नालंदा आज भी क्षेत्र के आधुनिक विश्वविद्यालयों को प्रेरित करता है, जिनमें वर्तमान नालंदा विश्वविद्यालय भी शामिल है।

टिम कर्टिस ने आगे कहा क‍ि विश्व धरोहर सूची में शामिल होना सिर्फ एक सम्मानजनक पहचान नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है।

इस अवसर पर भारत में संयुक्त राष्ट्र के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रीसनर ने कहा क‍ि "नालंदा ऐसा विषय है जो संयुक्त राष्ट्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीखने, संवाद और सीमाओं के पार ज्ञान के आदान-प्रदान की उस शक्ति को दर्शाता है जो समाजों के विकास को आकार देती है।

भारत आने से पहले मुझे इस बात पर काफी गर्व था कि मैंने यूरोप के उस शहर में पढ़ाई की है, जहां दुनिया के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक, बोलोनिया विश्वविद्यालय, स्थित है, जिसकी स्थापना 1088 ईस्वी में हुई थी। 'यूनिवर्सिटी' शब्द भी वहीं से निकले 'यूनिवर्सिटास' से आया है, लेकिन नालंदा उससे लगभग 600 साल पुराना है।

--आईएएनएस

एवाई/डीकेपी

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