पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम आ चुका है और यहां 30 वर्षों का रिकॉर्ड टूट गया है. जन सुराज पार्टी के संस्थापक और उम्मीदवार प्रशांत किशोर करीब 19 हजार वोटों से चुनाव जीत चुके हैं.
बीजेपी का गढ़ मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट पर पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. यह हार ऐसे समय में आई है जब 2006 से लगातार नितिन नवीन इस सीट से विधायक रहे थे और उनसे पहले 1995 से उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा विधायक रहे.
इसी साल बीजेपी ने नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया. दूसरी ओर, पहली बार बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बना है. ऐसे में राजधानी पटना के वीवीआईपी इलाके माने जाने वाले बांकीपुर के मतदाताओं की ओर से बीजेपी को नकारे जाने के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. इस बात का विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं कि बीजेपी की हार के पांच बड़े कारण क्या-क्या हैं?
CM सम्राट चौधरी के खिलाफ लोगों में नाराजगी!
बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ लोगों की नाराजगी का भी दावा किया जा रहा है. कई लोगों का मानना है कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी के लिए सही फैसला नहीं था. इसका असर सिर्फ बांकीपुर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में देखने को मिल रहा है. बांकीपुर पहला चुनाव था, इसलिए इस नाराजगी का सीधा असर यहां के नतीजों में दिखाई दिया.
मतदान प्रतिशत का बदलता पैटर्न!
बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी की हार की एक वजह मतदान प्रतिशत के बदलते पैटर्न के तौर पर सामने आ रही है. बीजेपी कार्यकर्ताओं के अनुसार, बांकीपुर विधानसभा में कुल 422 मतदान केंद्र हैं. इनमें से 250 ऐसे मतदान केंद्र हैं जहां बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है. पहले इन बूथों पर विपक्ष को बेहद कम वोट मिलते थे, लेकिन इस बार इन 250 मतदान केंद्रों पर करीब 9 प्रतिशत कम मतदान हुआ.
वहीं लगभग 50 ऐसे मतदान केंद्र हैं जहां विपक्ष का प्रभाव रहा है और आरजेडी को बढ़त मिलती रही है. इस बार इन केंद्रों पर 2025 की तुलना में करीब 7 प्रतिशत अधिक मतदान हुआ. दावा किया जा रहा है कि आरजेडी का एम-वाई (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक भी बड़ी संख्या में प्रशांत किशोर के पक्ष में गया, जिससे उनके समर्थकों की सक्रियता साफ दिखाई दी.
जातीय समीकरण
जातीय समीकरण ने भी बांकीपुर उपचुनाव में अहम रोल अदा किया है. माना जा रहा है कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से भूमिहार समाज का एक वर्ग नाराज था. बांकीपुर में भूमिहार मतदाता करीब 7 प्रतिशत हैं और दावा किया जा रहा है कि इनमें से लगभग 60 प्रतिशत वोट प्रशांत किशोर के पक्ष में गए. वहीं, नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कुर्मी समाज में भी नाराजगी रही. यहां 5 प्रतिशत से अधिक कुर्मी मतदाता हैं और ऐसा माना जा रहा है कि उनमें से 50 प्रतिशत से अधिक वोट प्रशांत किशोर को मिले.
इसके अलावा, नीतीश कुमार का 'चुप्पा वोटर' मानी जाने वाली महिला मतदाताओं का 50 प्रतिशत से अधिक समर्थन भी प्रशांत किशोर के खाते में गया. नीतीश कुमार की अपील और प्रशांत किशोर द्वारा एआई वीडियो का मुद्दा उठाने का भी असर देखने को मिला. दावा है कि जेडीयू का वोट पूरी तरह बीजेपी में ट्रांसफर नहीं हो सका.
प्रशांत किशोर की अन्य सामाजिक वर्गों में सेंध!
दावा है कि जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अन्य सामाजिक वर्गों में सेंध लगाई. जानकारों के मुताबिक, कायस्थ मतदाता बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है. हालांकि इसमें बड़ी टूट नहीं हुई, लेकिन 5 से 10 प्रतिशत तक वोट खिसकने का दावा किया जा रहा है. इसके अलावा राजपूत, अति पिछड़ा और दलित समुदाय के मतदाताओं का भी एक हिस्सा प्रशांत किशोर के पक्ष में गया, जिसका असर चुनाव परिणाम में देखने को मिला.
कई समुदायों की नाराजगी!
बीजेपी की पूरी ताकत झोंकने के बावजूद जनमत का बदलना इस बात का संकेत है कि पार्टी को पहले से अंदेशा था कि प्रशांत किशोर के मैदान में उतरने से मुकाबला कठिन हो सकता है. यही वजह रही कि एक विधानसभा सीट के लिए पार्टी ने 40 स्टार प्रचारकों के साथ-साथ एनडीए के सभी घटक दलों के बड़े नेताओं को प्रचार में उतारा. डोर-टू-डोर कैंपेनिंग भी की गई, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मतदाता पहले ही अपना मन बना चुके थे. जातीय समीकरणों के बीच कई समुदायों ने अपनी नाराजगी मतदान के जरिए जाहिर की, जिसका असर अंतिम परिणाम में साफ दिखाई दिया.
बांकीपुर: प्रशांत किशोर की जीत पर तेज प्रताप ने दी बधाई, 'प्रचंड विजय...'
Author : परमानंद सिंह

