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Explained: ...तो इस वजह से FIFA नहीं खेलती भारतीय टीम! 139वीं रैंकिंग और एशिया में 26वां स्थान, क्या यह वाकई भारत है?

Explained: ...तो इस वजह से FIFA नहीं खेलती भारतीय टीम! 139वीं रैंकिंग और एशिया में 26वां स्थान, क्या यह वाकई भारत है?

र चार साल में एक ही सवाल देश भर के फुटबॉल फैंस के जेहन में कौंधता है कि आखिर भारत FIFA वर्ल्ड कप क्यों नहीं खेलता? 1.4 अरब की आबादी, क्रिकेट के बाद फुटबॉल का सबसे बड़ा फैनबेस, लाखों युवा खिलाड़ी और फिर भी...

1930 में टूर्नामेंट की शुरुआत के बाद से भारत ने एक भी वर्ल्ड कप मैच नहीं खेला है. सबसे ज्यादा दिल दुखाने वाली बात यह है कि हम कभी क्वालीफाई नहीं कर पाए, बल्कि क्वालीफाई करके भी हम खुद चले गए. यह उस एक फैसले की कहानी है जिसने भारतीय फुटबॉल की दिशा बदल दी और उन 75 सालों की जो बस 'काश' में बीत गए...

1950: वो वर्ल्ड कप जहां पहुंचना था, लेकिन भारत ने कर दिया इनकार

हां, आपने सही पढ़ा. भारत ने 1950 के FIFA वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर लिया था. उस वक्त की क्वालीफिकेशन प्रोसेस बिल्कुल अलग थी. 34 टीमों ने 16 सीटों के लिए एंट्री ली थी, लेकिन दूसरे वर्ल्ड युद्ध के बाद की आर्थिक तबाही के चलते कई टीमों ने वापसी कर ली.

भारत को एशियाई क्वालीफाइंग ग्रुप में बर्मा (अब म्यांमार), इंडोनेशिया और फिलीपींस के साथ रखा गया था. लेकिन तीनों टीमें क्वालीफायर शुरू होने से पहले ही हट गईं. नतीजतन, बिना एक भी मैच खेले, बिना एक गोल किए, भारत सीधे ब्राजील में होने वाले वर्ल्ड कप के फाइनल ड्रा में पहुंच गया. 22 मई 1950 को रियो डी जनेरियो में हुए ड्रा में भारत को ग्रुप 3 में स्वीडन, पैराग्वे और डिफेंडिंग चैंपियन इटली के साथ डाल दिया गया.

28 जून 1950 को भारत को अपना पहला वर्ल्ड कप मैच खेलना था. लेकिन टीम कभी ब्राजील पहुंची ही नहीं. भारत ने वर्ल्ड कप से वापसी कर ली.

'बिना जूते के खेलने की इजाजत नहीं मिली' वाला मिथक

आपने यह कहानी जरूर सुनी होगी कि 'FIFA ने भारतीय खिलाड़ियों को नंगे पैर खेलने से मना कर दिया, इसलिए भारत ने वर्ल्ड कप छोड़ दिया.' यह कहानी इतनी जोरदार है कि लगभग हर भारतीय फुटबॉल फैन इस पर यकीन करता है. लेकिन फुटबॉल इतिहासकारों के मुताबिक, यह एक मिथक से ज्यादा कुछ नहीं है. LA टाइम्स, BBC, इंडियन एक्सप्रेस और भारतीय फुटबॉल टीम के 75 साल पूरे होने पर छपी किताब 'बॉक्स टू बॉक्स' में इस मिथक को बुरी तरह खारिज किया है.

तो आखिर क्या थी असली वजहें?

इतिहासकार अब तीन बातों पर सहमत हैं:

  • भारी यात्रा खर्च: आजादी के तीन साल बाद भी भारत आर्थिक रूप से कमजोर था. इतनी दूर (ब्राजील) जाने का खर्च AIFF के लिए बहुत ज्यादा था.
  • तैयारी का कम वक्त: न्योता इतना लेट मिला कि टीम को तैयार करना और सारी लॉजिस्टिक्स जुटाना नामुमकिन था.
  • वर्ल्ड कप की अहमियत नहीं समझी: AIFF उस वक्त ओलंपिक को फुटबॉल का सबसे बड़ा मंच मानता था, न कि वर्ल्ड कप को.

जब भारत एशिया का सबसे बड़ा फुटबॉल प्लेयर था

यह सोचकर हैरानी होती है कि 1950 और 1960 के दशक के शुरू में भारत एशियाई फुटबॉल की सबसे बड़ी ताकतों में से एक था. 'भारतीय फुटबॉल का जादूगर' कहे जाने वाले कोच सैयद अब्दुल रहीम की लीडरशिप में टीम ने 1951 नई दिल्ली एशियाई खेलों में गोल्ड जीता.

1962 में जकार्ता एशियाई खेलों में फिर से गोल्ड जीता. 1956 मेलबर्न ओलंपिक में भारत चौथे स्थान पर रहा. 1964 में एशिया कप में भारत रनर-अप रहा. 1950 से 1960 के दशक के बीच भारत ओलंपिक के लिए लगातार क्वालीफाई करता रहा. साल 1948 लंदन ओलंपिक में फ्रांस को 2-1 से हराने से बस एक कदम दूर रही टीम ने दुनिया को दिखा दिया था कि नंगे पैर भी कोई जंग जीती जा सकती है.

फिर अचानक सब बदल गया. 1970 के दशक में भारतीय फुटबॉल ने वही किया, जो कभी नहीं करना चाहिए था- गुमनामी की ओर लौटना.

2026 के क्वालीफिकेशन मैच में क्या हुआ?

अब बात करते हैं सबसे ताजा चोट की. जब 2026 के वर्ल्ड कप के क्वालीफायर शुरू हुए, तो भारत का ग्रुप A बहुत मुश्किल था. कतर, कुवैत और अफगानिस्तान. एक बार फिर उम्मीदों की ट्रेन ने पटरी छोड़ दी. कतर के खिलाफ एक मैच ऐसा आया, जिसने सच में दिल तोड़ दिया.

विवादास्पद रेफरी के फैसले के चलते कतर ने 2-1 से जीत दर्ज की और भारत 2026 वर्ल्ड कप की क्वालीफिकेशन रेस से बाहर हो गया. तब कोच इगोर स्टीमैक ने खुलकर कहा कि वे 'निराश' हैं. इससे भी बुरी बात यह थी कि इस हार ने भारत को 2027 एशिया कप के ऑटोमैटिक क्वालीफिकेशन से भी बाहर कर दिया.

139वीं रैंकिंग और एशिया में 26वां स्थान: क्या यह वाकई 'भारत' है?

हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लगातार हार के सिलसिले ने भारत को FIFA रैंकिंग में 139वें स्थान पर पहुंचा दिया है. एशियाई देशों में यह 26वां स्थान है. नीचे गिरने का यह सिलसिला तब और तेज हुआ जब भारत ने 2026 के यूनिटी कप में लगातार हार झेली और 3-1 से ताजिकिस्तान से शिकस्त खाई. पहले भारत ने बांग्लादेश और सिंगापुर से भी हार का सामना किया था. भारत आज उन 26 टीमों में जगह बनाए हुए है, जो एशिया कप के दूसरे राउंड में सीधे क्वालीफाई कर सकती हैं. लेकिन अगर एक-दो और हार हो गई, तो यह सीट छिन सकती है और 2030 वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई करना और भी मुश्किल हो जाएगा.

तो फिर आखिर समस्या क्या है?

1. क्लब बनाम देश: दशकों से चला आ रहा संघर्ष

देश भर के फुटबॉल पंडित इसी एक बात पर उंगली उठाते हैं कि क्लब खिलाड़ियों को छोड़ना नहीं चाहते. यह एक पुरानी बीमारी है. 2006 में तत्कालीन कोच बॉब ह्यूटन तब आग बबूला हो गए थे, जब ईस्ट बंगाल और मोहन बागान ने स्थानीय लीग के लिए अपने प्रमुख खिलाड़ियों को नेशनल कैंप से वापस बुला लिया. 2023 में हांगझोउ एशियाई खेलों में भी क्लबों ने मना कर दिया. 2024 में भी जब टीम लंदन में यूनिटी कप के लिए जा रही थी, तो मोहन बागान ने फिर खिलाड़ी नहीं छोड़े. पूर्व भारतीय खिलाड़ी मेहताब हुसैन ने ठीक ही कहा, 'दुखों की सूची बहुत लंबी है'.

2. ग्रासरूट्स: जहां सबसे बड़ी खाई

दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ी 8-10 साल की उम्र से स्ट्रक्चर्ड अकादमियों में ढलते हैं. यहां भारत में क्वालिटी कोच, स्काउटिंग और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अकाल है. ISL पैसे तो खूब लुटाता है, लेकिन उसका एक छोटा सा हिस्सा भी ग्रासरूट्स तक नहीं पहुंचता.

3. क्रिकेट का लंबा साया

आखिरकार, सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि क्रिकेट भारत में सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक धर्म है. BCCI की सालाना कमाई (लगभग 4,000 करोड़ रुपये) के सामने AIFF का बजट बौना है. अगर भारत ने 1950 में वर्ल्ड कप खेला होता और कुछ चमत्कार कर दिखाया होता, तो 1983 की क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत से बहुत पहले ही देश में फुटबॉल क्रांति आ जाती. लेकिन इतिहास के साथ 'काश' नहीं चलता.

AIFF प्रशासन के भीतर आपसी गुटबाजी भी है. ISL और I-लीग के बीच झगड़ा, कानूनी मुकदमेबाजी और राइट्स एग्रीमेंट को लेकर खिंचातानी चलती रहती है. रॉबिन सिंह का तो सीधा सवाल है कि क्या यह पूरी व्यवस्था आत्मनिरीक्षण करने को तैयार है?

तो क्या 2030 में भारत FIFA खेल पाएगा?

अभी ट्रेन में देर लग सकती है, लेकिन इंजन ने सीटी बजा दी है. AIFF अब 'नेशनल फुटबॉल फिलॉस्फी' पर पूरे देश में कंसल्टेशन कर रहा है. FIFA ने भारत की मदद के लिए आर्सेन वेंगर की नियुक्ति की है. ISL अब धीरे-धीरे यूथ डेवलपमेंट पर ध्यान दे रहा है, लेकिन अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है.

Author : ज़ाहिद अहमद

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: ABP Live Hindi