भारत में कानून साफ तौर पर कहता है कि हथकड़ी लगाना कोई आम बात नहीं है. प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन के अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बेवजह हथकड़ी लगाना इंसान की गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है.
इसका मतलब है कि पुलिस हर गिरफ्तारी या फिर किसी को ले जाते समय अपने आप हथकड़ी का इस्तेमाल नहीं कर सकती.
पुलिस को सिर्फ कुछ खास हालातों में ही हथकड़ी लगाने की इजाजत है. इनमें ऐसे हालात शामिल हैं जहां इस बात का पक्का अंदेशा हो कि आरोपी हिरासत से भाग सकता है, हिंसक हो सकता है या फिर गिरफ्तारी के दौरान सहयोग करने से मना कर सकता है. ऐसे मामलों में हथकड़ी लगाने को एक बचाव के तौर पर देखा जाता है.
भारतीय न्यायिक सुरक्षा संहिता की धारा 43(3) के तहत पुलिस के पास गंभीर मामलों में हथकड़ी लगाने का ज्यादा साफ अधिकार है. इसमें हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, नशीले पदार्थ से जुड़े अपराध और आदतन अपराधियों या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले मामले शामिल हैं.
हथकड़ी लगाने पर भी पुलिस को सख्त नियमों का पालन करना होता है. अधिकारियों को लिखित में साफ-साफ वजह बतानी होती है कि हथकड़ी लगाना क्यों जरूरी था.
आम हालात में खासतौर पर जब विचाराधीन कैदियों को ले जाया जा रहा हो तो पुलिस को हथकड़ी लगाने से पहले मजिस्ट्रेट से इजाजत लेनी पड़ती है.
कानून साफ तौर पर हथकड़ी का इस्तेमाल सजा देने या फिर किसी को जलील करने के लिए करने से रोकता है. इसका मकसद पूरी तरह से बचाव करना है.

