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जम्मू-कश्मीर में 2 साल से खाली है एडवोकेट जनरल का पद, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

जम्मू-कश्मीर में 2 साल से खाली है एडवोकेट जनरल का पद, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने सोमवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सरकार को नोटिस जारी किया. इस याचिका में केंद्र शासित प्रदेश के लिए तुरंत एक रेगुलर एडवोकेट जनरल की नियुक्ति की मांग की गई थी.

बेंच ने कहा कि खाली पद को 'आदर्श रूप से सुनवाई की अगली तारीख' तक भर दिया जाना चाहिए, जो 21 अक्टूबर तय की गई है.

जम्मू-कश्मीर में एडवोकेट जनरल का पद अक्टूबर 2024 से खाली है, जब उमर अब्दुल्ला सरकार के सत्ता में आने के बाद डी.सी. रैना ने इस्तीफा दे दिया था. इसके चलते केंद्र शासित प्रदेश लगभग दो साल से अपने मुख्य संवैधानिक कानून अधिकारी के बिना है.

21 अक्टूबर तक देना है जवाब

चीफ जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस रजनेश ओसवाल की बेंच ने जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश को उसके मुख्य सचिव और कानून सचिव के माध्यम से नोटिस जारी किया, जिसका जवाब 21 अक्टूबर (सुनवाई की अगली तारीख) तक देना है.जम्मू में वकील हर्ष दुबे द्वारा वकील कन्नू करण प्रशर के माध्यम से दायर इस PIL में सक्षम अधिकारी को एडवोकेट जनरल के संवैधानिक पद को भरने के लिए तुरंत कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है. यह पद काफी समय से खाली पड़ा है. वर्चुअल सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने कहा कि एडवोकेट जनरल का पद आदर्श रूप से सुनवाई की अगली तारीख तक भर दिया जाना चाहिए.

याचिकाकर्ता, जो हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं, ने याचिका में कहा कि इस मामले में उनका कोई निजी हित नहीं है और वे जनहित में कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं. उनका कहना है कि संवैधानिक पद के लंबे समय से खाली रहने से न्याय प्रशासन और इस पद से जुड़े कानूनी कार्यों के निर्वहन पर असर पड़ा है.

पुराने आदेश का किया गया जिक्र

याचिका में 4 जून, 2025 को हाई कोर्ट द्वारा 'श्री नव दुर्गा झलेरी माता ट्रस्ट बनाम UT of J&K और अन्य' (WP(C) No. 1433/2025) मामले में पारित एक पुराने आदेश का भी जिक्र किया गया है. उस आदेश में कोर्ट ने लंबे समय से खाली पड़े पद पर ध्यान दिया था और कहा था कि इससे 'कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1908' की धारा 92 - जो सार्वजनिक धर्मार्थ और धार्मिक ट्रस्टों से जुड़े मामलों में एडवोकेट जनरल की भूमिका की बात करती है . 'व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी' हो रही है.

याचिकाकर्ता ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस पद के खाली रहने से 'जम्मू-कश्मीर एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ट्रस्टी कमेटी' के कामकाज पर असर पड़ा है, क्योंकि 'एडवोकेट्स वेलफेयर फंड एक्ट, 2001' और कमेटी बनाने वाली अधिसूचना (S.O. 466 of 2022) के तहत एडवोकेट जनरल इसके पदेन अध्यक्ष (ex-officio Chairperson) होते हैं.

प्रतिवादियों का हलफनामा मांगा गया

याचिका में प्रतिवादियों (respondents) को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे 'जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019' की धारा 79 के तहत एडवोकेट जनरल की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करें और इसे कोर्ट द्वारा तय उचित समय-सीमा के भीतर पूरा करें. इसमें 'एडवोकेट्स वेलफेयर फंड ट्रस्टी कमेटी' के सुचारू कामकाज के लिए निर्देश देने और प्रतिवादियों से एक हलफनामा (affidavit) दाखिल करने की भी मांग की गई है, जिसमें पद के लंबे समय से खाली रहने के कारणों और अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी हो.

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि यह याचिका इस पद पर किसी खास व्यक्ति की नियुक्ति की मांग नहीं करती है, बल्कि इसका मकसद केवल कानून के अनुसार जल्द कार्रवाई सुनिश्चित करना है. जम्मू-कश्मीर में एडवोकेट जनरल (AG) के नामांकन को लेकर चल रही खींचतान, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के बीच कार्यकारी शक्तियों के संघर्ष का मुख्य केंद्र-बिंदु है.

डीसी रैना ने 2024 अक्टूबर में दिया था इस्तीफा

अक्टूबर 2024 में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) सरकार के सत्ता संभालने के तुरंत बाद, मौजूदा AG, डी.सी. रैना ने अपना इस्तीफा सौंप दिया था. महत्वपूर्ण क्षेत्रीय कानूनी मामलों में निरंतरता बनाए रखने के लिए, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस्तीफा नामंजूर कर दिया और रैना को केंद्र शासित प्रदेश (UT) का प्रतिनिधित्व जारी रखने का निर्देश दिया.

उपराज्यपाल (LG) के कार्यालय और केंद्र सरकार ने अब्दुल्ला के फैसले का पुरजोर विरोध किया और रैना को बनाए रखने से जुड़ी फाइलों को सक्रिय रूप से रोक दिया. केंद्र सरकार का तर्क था कि चुनी हुई सरकार शीर्ष कानूनी अधिकारियों की नियुक्ति के मामले में एकतरफा फैसला नहीं ले सकती.

एक-दूसरे के नामाकंन पर सहमति नहीं बन पा रही

'ट्रांजैक्शन ऑफ़ बिज़नेस रूल्स' (TBR) को अंतिम रूप न दिए जाने के कारण, उपराज्यपाल कार्यालय का तर्क है कि नियुक्ति का अधिकार उनके विवेकाधीन क्षेत्र में आता है, जबकि मुख्यमंत्री की कैबिनेट का कहना है कि चयन में चुनी हुई सरकार के जनादेश की झलक मिलनी चाहिए. नतीजतन, कोई भी पक्ष दूसरे के नामांकित व्यक्ति को मंज़ूरी नहीं दे रहा है, जिससे चयन प्रक्रिया पूरी तरह से ठप हो गई है.

मुख्यमंत्री और उप-राज्यपाल के कार्यालय उत्तराधिकारी के नाम पर सहमत नहीं हो पाए, जिससे केंद्र-शासित प्रदेश बिना किसी शीर्ष संवैधानिक कानून अधिकारी के रह गया है. क्योंकि कोई भी पक्ष दूसरे के उम्मीदवार को मानने को तैयार नहीं है. कानूनी समुदाय में बढ़ती निराशा को देखते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने दखल दिया और प्रशासन को इस गतिरोध को सुलझाने के लिए पांच हफ़्ते की सख्त समय-सीमा दी.

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Author : आसिफ कुरैशी, एबीपी न्यूज़

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