लोकसभा में चर्चा के दौरान बीते दिन जमकर हंगामा देखने को मिला, जब राहुल गांधी ने अपने भाषण के दौरान 'इडियट' और 'अंधभक्त' शब्दों का इस्तेमाल कर दिया. अब सदन में बिल संशोधन पर गर्मा-गर्मी से भरी चर्चा होना तो आम बात है, लेकिन जब बयानों में भाषा की मर्यादा लांघ दी जाती है तो विवाद होना तय है.
अब राहुल गांधी की इस बात पर सत्ता पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई है, जिसके बाद फिर असंसदीय शब्दों पर बहस छिड़ गई है. आइए फिर जान लेते हैं कि आखिर असंसदीय शब्द क्या होते हैं, इनकी परिभाषा क्या है और किन शब्दों को बोलने पर संसद में रोक लगाई गई है, कौन से नियम इसे तय करते हैं.
आखिर है क्या असंसदीय शब्द की परिभाषा?
संसद की नियमपुस्तिका की मानें तो कोई भी ऐसा शब्द जो अशिष्ट, अपमानजनक, अभद्र, मानहानिकारक या फिर किसी पद और व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला हो, उसे असंसदीय माना जाता है. हालांकि संविधान या किसी कानून में असंसदीय शब्दों की कोई अंतिम या फिर स्थाई परिभाषा तय नहीं की गई है. सदन के अंदर किसी बयान को मर्यादित या फिर अमर्यादित मानने का सर्वाधिकार सिर्फ पीठासीन अधिकारी को दिया गया है. वे पूरे संदर्भ को देखने के बाद ही यह तय करते हैं कि टिप्पणी स्वीकार्य है या नहीं.
संसद में शब्दों की बैन लिमिट क्या है?
आम जनता में यह भ्रम हमेशा देखने को मिलता है कि संसद में कुछ शब्दों पर हमेशा के लिए परमानेंट बैन लगा होता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. लोकसभा सचिवालय समय-समय पर Unparliamentary Expressions के नाम से एक संदर्भ पुस्तक जारी करता है. इसमें उन सभी शब्दों और वाक्यांशों का ब्योरा दिया होता है, जिनको अतीत में विभिन्न अध्यक्षों ने रिकॉर्ड से हटाया था. कोई शब्द एक संदर्भ में असंसदीय हो भी सकता है, जबकि दूसरे प्रसंग में वह सामान्य हो सकता है. इसलिए यह पूरी परिस्थिति और पीठसीन अधिकारी के विवेक पर निर्भर करता है.

शब्दों को एक्सपंज करने का अर्थ?
जब स्पीकर किसी बयान या फिर शब्द को हटाने का आदेश दे देते हैं, तो इसका सीधा अर्थ होता है कि वह हिस्सा अब संसद के ऑफिशियल रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है. संसद की लाइब्रेरी और वेबसाइट पर दर्ज कार्यवाही में उन शब्दों के स्थान पर (*) निशान लगा दिया जाता है. भले ही मीडिया, सोशल मीडिया या वीडियो फुटेज में वे बयान पहले ही प्रसारित हो चुके हों, लेकिन कानूनी और संवैधानिक रूप से वे शब्द संसद में कभी नहीं बोले गए माने जाते हैं.
राहुल गांधी ने ऐसा क्या है, जिस पर हुआ विवाद?
संसद में चर्चा के दौरान राहुल गांधी समाज के विभिन्न वर्गों का उल्लेख करते हुए जंतर-मंतर पर हुए प्रोटेस्ट को लेकर अभ्यर्थियों की बात रख रहे थे. इस दौरान उन्होंने इडियट और अंधभक्त जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया. इन शब्दों पर तुरंत सत्ता पक्ष ने कड़ा एतराज जताया. उनके द्वारा इस्तेमाल की गई शब्दावलियों पर तीखा विरोध दर्ज कराया गया. बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों पक्षों के नेताओं के बीच नारेबाजी शुरू हो गई और सदन की कार्यवाही बाधित हुई. तभी केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मोर्चा संभालते हुए कहा कि सदन के अंदर इस तरीके की अमर्यादित शब्दावली का इस्तेमाल पूरी तरह से गलत है और इसके लिए उनको माफी मांगनी चाहिए. इसके जवाब में राहुल गांधी ने सफाई दी कि यह टिप्पणी किसी व्यक्तिगत सांसद के खिलाफ नहीं थी, फिर भी यदि आपत्ति है तो वे अन्य शब्दों का चयन कर सकते हैं.

इन शब्दों पर स्पीकर ने क्या लिया फैसला?
सदन में हंगामे और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की औपचारिक शिकायत के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इसकी समीक्षा की. निष्पक्षता के नियमों का पालन करते हुए अध्यक्ष ने राहुल गांधी के द्वारा कहे गए विवादित शब्दों को लोकसभा की आधिकारिक कार्यवाही से हटाने का स्पष्ट आदेश जारी कर दिया. इस निर्णय के बाद यह विवादित हिस्सा हमेशा के लिए संसदीय दस्तावेजों से बाहर कर दिया गया और सदन में एक बार फिर विधायी कार्यों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया.
Author : निधि पाल

