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Padmini Ekadashi Vrat Katha: पद्मिनी एकादशी व्रत से जन्मीं थीं रावण को हराने वाली संतान, पूजा में पढ़ें ये कथा

Padmini Ekadashi Vrat Katha: पद्मिनी एकादशी व्रत से जन्मीं थीं रावण को हराने वाली संतान, पूजा में पढ़ें ये कथा

Padmini Ekadashi 2026: अधिकमास की पद्मिनी एकादशी 27 मई 2026 को है. इस व्रत के प्रताप से सुयोग्य और समस्त संकटों का नाश करने वाली संतान प्राप्त होती है. पद्मिनी एकादशी व्रत की पूजा में इस कथा का श्रवण करें.

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन अधिक मास (लौंद) की एकादशी अत्यधिक पुण्य प्रदान करने वाली है, इसका नाम पद्मिनी है. इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है. इस एकादशी के व्रत का विधान मैंने सर्वप्रथम देवर्षि नारद से कहा था. यह विधान अनेक पापों को नष्ट करने वाला तथा मुक्ति एवं भक्ति प्रदान करने वाला है. इसके फल का ध्यानपूर्वक श्रवण करो.

यह सुन्दर कथा महर्षि पुलस्त्य ने नारदजी से कही थी एक समय कार्तवीर्य ने रावण को अपने बन्दीगृह में बन्दी बना लिया. उसे महर्षि पुलस्त्य ने कार्तवीर्य से विनय करके छुड़ाया. इस घटना को सुनकर नारदजी ने महर्षि पुलस्त्य से पूछा - "हे महर्षि! इस मायावी रावण को, जिसने सभी देवताओं सहित देवराज इन्द्र को जीत लिया था, कार्तवीर्य ने उसे किस प्रकार जीता? कृपा कर मुझे विस्तारपूर्वक बतायें.

महर्षि पुलस्त्य ने कहा हे नारद आप पहले कार्तवीर्य की उत्पत्ति की कथा श्रवण करो त्रेतायुग में महिष्मती नामक नगरी में कार्तवीर्य नाम का एक राजा राज्य करता था. उस राजा की सौ स्त्रियां थीं, उनमें से किसी के भी राज्य का भार सम्भालने वाला योग्य पुत्र नहीं था. तब राजा ने सम्मानपूर्वक ब्राह्मणों को आमंत्रित किया. पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाए, किन्तु सब व्यर्थ रहे. जिस प्रकार दुखी मनुष्य को भोग नीरस प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार राजा को भी अपना राज्य पुत्र के बिना दुःखमय प्रतीत होता था.

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अंत में वह तप के द्वारा ही सिद्धियों को प्राप्त जानकर तपस्या करने के लिये वन को चला गया. उसकी स्त्री, जो राजा हरिश्चन्द्र की पुत्री प्रमदा थी, वस्त्रालङ्कारों को त्यागकर अपने पति के साथ गन्धमादन पर्वत पर चली गयी. उस स्थान पर इन लोगों ने दस हजार वर्ष तक तप किया, किन्तु सिद्धि प्राप्त न हो सकी. राजा की देह अस्थियों का ढाँचा मात्र ही रह गयी. यह देख प्रमदा ने श्रद्धापूर्वक महासती अनसूया से प्रश्न किया मेरे स्वामी को तप करते हुये दस हजार वर्ष व्यतीत हो गये, किन्तु अभी तक प्रभु प्रसन्न नहीं हुये हैं, जिससे मुझे पुत्र प्राप्त हो. इसका क्या कारण है?

प्रमदा का प्रश्न सुनकर देवी अनसूया ने कहा अधिक (लौंद) मास जो कि छत्तीस माह के उपरान्त आता है, उसमें दो एकादशी होती हैं. इसमें शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी तथा कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम परम है. इनके जागरण एवं व्रत करने से ईश्वर तुम्हें अवश्य ही पुत्र प्रदान करेंगे.

तत्पश्चात् देवी अनसूया ने व्रत का विधान बताया. रानी प्रमदा ने देवी अनसूया द्वारा वर्णित विधि के अनुसार एकादशी का व्रत एवं रात्रि में जागरण किया. इससे भगवान विष्णु उस पर बहुत प्रसन्न हुये तथा वरदान माँगने को कहा. रानी प्रमदा ने कहा प्रभु आप यह वरदान मेरे पति को दीजिये.

रानी प्रमदा का वचन सुन भगवान विष्णु ने कहा हे रानी प्रमदा मलमास मुझे अत्यन्त प्रिय है. उसमें भी एकादशी तिथि मुझे सर्वाधिक प्रिय है. इस एकादशी का व्रत तथा रात्रि जागरण तुमने विधानपूर्वक किया, इसीलिये मैं तुम पर अति प्रसन्न हूं इतना कहकर भगवान विष्णु ने राजा से कहा हे राजन तुम अपना इच्छित वर माँगो, क्योंकि तुम्हारी स्त्री ने मुझे प्रसन्न किया है.

भगवान की अमृत वाणी सुन राजा ने कहा हे प्रभो आप मुझे सर्वोत्तम, सभी के द्वारा पूजित तथा आपके अतिरिक्त देव, असुर, मनुष्य आदि से अजेय पुत्र प्रदान करें. राजा को इच्छित वर देकर प्रभु अन्तर्धान हो गये. इसके बाद दोनों अपने राज्य को वापस आ गए.

समय आने पर इन्हीं के पुत्र के रूप में कार्तवीर्य उत्पन्न हुये थे. यह भगवान श्रीहरि के अतिरिक्त सभी से अजेय थे. कार्तवीर्य ने रावण पर विजय प्राप्त कर ली थी. यह सब पद्मिनी एकादशी के व्रत का प्रभाव था. इतना वृत्तान्त सुनाने के उपरान्त महर्षि पुलस्त्य वहाँ से प्रस्थान कर गये.

श्रीकृष्ण ने कहा हे कुन्ती पुत्र अर्जुन यह मैंने अधिक (लौंद) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत वर्णित किया है. जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह विष्णुलोक को जाता है. सूतजी ने कहा हे ऋषिश्रेष्ठों जो आपने जानना चाहा था, सो मैंने कह दिया. अब आप क्या जानना चाहते हैं? जो मनुष्य इस व्रत कथा को सुनेंगे, वे स्वर्गलोक के अधिकारी हो जायेंगे.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

Author : जागृति सोनी बरसले

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