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Ranga Billa Case: कौन थे रंगा-बिल्ला, जिन पर बनी वेब सीरीज राख सुर्खियों में छाई?

Ranga Billa Case: कौन थे रंगा-बिल्ला, जिन पर बनी वेब सीरीज राख सुर्खियों में छाई?

Ranga Billa Case: ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई वेब सीरीज राख इन दिनों काफी चर्चा में है. अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर और राकेश बेदी स्टारर के साथ बनी यह सीरीज 1978 के उसे चर्चित रंगा बिल्ला केस से प्रेरित है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था.

दो मासूम भाई-बहन गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के अपहरण अत्याचार और हत्या की इस घटना ने उस दौर में कानून व्यवस्था, बच्चों की सुरक्षा और पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे. करीब 48 साल बाद राख के जरिए मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है और पूरे देश भर में एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस वेब सीरीज के चलते सवाल उठने लग गए हैं कि आखिर रंगा-बिल्ला कौन थे, जिन्होंने देश के सबसे चर्चित अपराधों में से एक को अंजाम दिया था.

कौन थे रंगा और बिल्ला?

रंगा का असली नाम कुलजीत सिंह और बिल्ला का असली नाम जसबीर सिंह था. दोनों पंजाब से थे और छोटे-मोटे अपराधों में शामिल रहते थे. शुरुआत में चोरी और दूसरी अपराधी गतिविधियों से जुड़े रहने के बाद दोनों ने अपहरण कर फिरौती वसूलने का रास्ता अपनाया. धीरे-धीरे उनकी आपराधिक गतिविधियां बढ़ती गई और 1978 में उन्होंने ऐसा अपराध किया जिसने पूरे देश को दहला दिया.

1978 में गीता और संजय का किया था अपहरण

26 अगस्त 1978 की शाम 16 वर्षीय गीता चोपड़ा और उनके 14 वर्षीय भाई संजय चोपड़ा घर से निकले थे. गीता को संसद मार्ग स्थित ऑल इंडिया रेडियो में युववाणी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था. दोनों भाई-बहन रास्ते में लिफ्ट लेकर वहां पहुंचने वाले थे, इस दौरान रंगा और बिल्ला ने उन्हें अपनी कार में बैठा लिया. थोड़ी देर में बच्चों की एहसास हुआ कि वे किडनैप हो चुके हैं. अपहरण के दौरान गीता और संजय अपराधियों से खुद को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन वे नाकाम रहे. इसके बाद अपराधी बच्चों को दिल्ली के एक सुनसान इलाके में ले गए. वहां पहले संजय की हत्या कर दी, उसके बाद गीता के साथ दुष्कर्म किया और फिर उसकी भी निर्मम हत्या कर दी. वहीं दो दिन बाद दोनों शव बरामद हुए तो पूरे देश में आक्रोश फैल गया.

देशभर में भड़का था रंगा और बिल्ला के खिलाफ गुस्सा

इस घटना ने लोगों को झकझोर कर दिया. देश में कई जगह पर विरोध प्रदर्शन हुए. इसके बाद यह मामला इतना चर्चित हो गया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि दोनों बच्चों पर बेरहमी से हमला किया गया. संजय के शरीर पर कई घाव मिले, जबकि गीता के शरीर पर भी गंभीर हमले के निशान थे.

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कैसे पकड़े गए रंगा और बिल्ला?

वारदात के बाद दोनों आरोपी दिल्ली से फरार होकर पहले मुंबई और फिर आगरा पहुंचे. इसके बाद दिल्ली लौटने के दौरान दोनों कालका मेल ट्रेन में गलती से सेना के जवानों के लिए आरक्षित डिब्बे में चढ़ गए. वहां मौजूद सैनिकों को उन पर शक हुआ. वहीं पहचान पत्र मांगने पर दोनों घबरा गए, इसके बाद जवानों ने दिल्ली पहुंचने पर दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया. वहीं इस मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने दोनों को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा, बाद में राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका भी खारिज कर दी गई.

31 जनवरी 1982 को दी गई थी रंगा और बिल्ली को फांसी

फांसी की सजा के बाद रंगा और बिल्ला को तिहाड़ जेल में रखा गया. बताया जाता है कि रंगा और बिल्ला को फांसी के दिन अंतिम औपचारिकताएं पूरी की गई. जेल अधिकारियों के अनुसार रंगा शांत था, जबकि बिल्ला घबराया हुआ था. वहीं तय समय पर दोनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया.

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Author : कविता गाडरी

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