Two Capitals State: भारत की विविधता सिर्फ संस्कृति और भाषा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां का प्रशासनिक ढांचा भी बेहद रोचक है. आमतौर पर हम जानते हैं कि हर राज्य की एक राजधानी होती है, लेकिन भारत के कई राज्य ऐसे हैं जो दो-दो राजधानियों से चलते हैं.
हाल ही में आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती को लेकर संसद में हुए बड़े फैसले ने इस चर्चा को फिर से ताजा कर दिया है. आखिर क्यों कुछ राज्यों को दो राजधानियों की जरूरत पड़ी और किन राज्यों में यह व्यवस्था आज भी लागू है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं.
अमरावती बनी आंध्र की स्थायी शक्ति
आंध्र प्रदेश की राजधानी को लेकर चल रहा लंबा इंतजार अब खत्म हो गया है. लोकसभा में अमरावती को राज्य की एकमात्र और स्थायी राजधानी के रूप में मान्यता देने वाला विधेयक पारित हो गया है. यह मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का एक महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट है. इस नई राजधानी को लगभग 217.23 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में बसाया जा रहा है. सरकार इस पर 65,000 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रही है. इस शहर की सबसे खास पहचान यहां बनने वाली 250 मीटर ऊंची विधानसभा होगी, जिसका डिजाइन उल्टे लिली के फूल जैसा होगा.
तीन राजधानियों का पुराना उलझाव
आंध्र प्रदेश का मामला काफी दिलचस्प रहा है. साल 2020 में राज्य सरकार ने सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए तीन राजधानियों का प्रस्ताव रखा था. इसमें विशाखापत्तनम को प्रशासनिक (कार्यकारी), अमरावती को विधायी और कुर्नूल को न्यायिक राजधानी बनाने की बात कही गई थी. हालांकि, यह मामला काफी समय तक कानूनी पेचीदगियों में फंसा रहा, लेकिन अब नए कानून के साथ अमरावती को ही पूरी तरह से मुख्य केंद्र मान लिया गया है, जिससे विकास की दिशा अब साफ हो गई है.
हिमाचल में शिमला और धर्मशाला का संगम
पहाड़ों की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था भी दो शहरों में बंटी हुई है. यहां की पहली और मुख्य राजधानी शिमला है, जिसे ग्रीष्मकालीन राजधानी कहा जाता है. वहीं, सर्दियों के मौसम में धर्मशाला को शीतकालीन राजधानी के रूप में उपयोग किया जाता है. ब्रिटिश काल से ही इन दोनों शहरों का राजनीतिक महत्व रहा है. आज भी सर्दियों के दौरान सरकारी कामकाज का एक बड़ा हिस्सा धर्मशाला से संचालित होता है, ताकि दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों के लोगों को शासन से जोड़ा जा सके.
उत्तराखंड में देहरादून से गैरसैंण तक का सफर
देवभूमि उत्तराखंड राज्य भी दो राजधानियों वाली व्यवस्था का पालन करता है. सालों से देहरादून राज्य की मुख्य राजधानी रहा है, जो शीतकाल में प्रशासनिक केंद्र होता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की भावनाओं और विकास की जरूरतों को देखते हुए गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया. सरकार का मकसद यह है कि राजधानी सिर्फ मैदानों तक सीमित न रहे, बल्कि पहाड़ के ऊंचे इलाकों के लोगों की समस्याओं का समाधान भी उनके करीब हो सके. यह भौगोलिक संतुलन बनाने की एक बेहतरीन कोशिश है.
महाराष्ट्र में मुंबई और नागपुर
महाराष्ट्र की पहचान उसकी आर्थिक राजधानी मुंबई से होती है, लेकिन नागपुर इसकी दूसरी और शीतकालीन राजधानी है. नागपुर को यह दर्जा मिलने के पीछे एक ऐतिहासिक नागपुर समझौता है, जो साल 1953 में हुआ था. इस राजनीतिक समझौते के तहत तय किया गया था कि साल का कम से कम एक विधानसभा सत्र नागपुर में आयोजित किया जाएगा. यही कारण है कि आज भी हर साल सर्दियों में महाराष्ट्र की पूरी सरकार और प्रशासन कुछ समय के लिए नागपुर स्थानांतरित हो जाता है.
चंडीगढ़ का अनोखा प्रशासन
राजधानियों के मामले में चंडीगढ़ का उदाहरण सबसे अलग है. यह शहर न केवल एक केंद्र शासित प्रदेश है, बल्कि पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी भी है. 1 नवंबर 1966 को जब पंजाब से अलग होकर हरियाणा बना, तब चंडीगढ़ को दोनों के प्रशासनिक केंद्र के रूप में चुना गया. आज भी यहां से दोनों राज्यों का शासन चलता है, जो भारत की प्रशासनिक एकता और समन्वय का एक जीता-जागता उदाहरण पेश करता है.
Author : निधि पाल

