देश की नामी कंपनी डाबर इंडिया इन दिनों अपनी ही शुद्धता के दावों के जाल में उलझ गई है. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने कंपनी को उसके शहद, घी और अन्य खाद्य उत्पादों पर लगे '100% शुद्ध' के लेबल को लेकर जोरदार फटकार लगाई है.
यह कार्रवाई महज एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश के पूरे FMCG सेक्टर में एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या खाने-पीने की चीजों का 100% शुद्ध होना वाकई मुमकिन है और क्या इससे बचने के लिए 99.9% शुद्धता का दावा किया जाता है...
डाबर मामला: आखिर FSSAI की नाराजगी की वजह क्या है?
पूरे विवाद की शुरुआत FSSAI के उस सख्त आदेश से हुई, जिसमें डाबर को उसके उत्पादों से '100% शुद्ध' और 'नेचुरल' जैसे सभी दावों को फौरन हटाने का निर्देश दिया गया. FSSAI ने अपने आदेश में साफ कहा कि किसी भी पैकेज्ड फूड आइटम पर '100% प्योर' लिखना न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि उपभोक्ताओं के साथ धोखा भी है.
नियामक संस्था का तर्क है कि जब भी कोई कृषि उत्पाद प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के स्टेप्स से गुजरता है, तो क्वालिटी में बदलाव आना तय है. FSSAI की इस कार्रवाई को एक व्यापक नजरिए से देखने की जरूरत है. संस्था ने सिर्फ डाबर को ही नहीं, बल्कि पूरे उद्योग के लिए एक गाइडलाइन जारी कर दी है कि अब कोई भी कंपनी अपने प्रोडक्ट पर पूर्ण शुद्धता का दावा नहीं कर सकती, क्योंकि यह वैज्ञानिक रूप से नामुमकिन है. कंपनी से अब इस मामले पर जवाब-तलब भी किया गया है और भविष्य में ऐसे किसी भी दावे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी है.
100% शुद्धता वैज्ञानिक रूप से संभव ही नहीं है100% शुद्धता नामुमकिन क्यों है?
किसी भी खाद्य पदार्थ के लिए 100% शुद्धता का दावा करना इसलिए नामुमकिन है, क्योंकि कुदरत में ही कोई भी चीज पूरी तरह से एकरूप और बिना किसी बाहरी तत्व के नहीं होती. शहद का ही उदाहरण लीजिए. मधुमक्खियां जिन फूलों से रस इकट्ठा करती हैं, वहां परागकणों, हवा की नमी और सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी जरूरी है. जब इस शहद को निकाला और पैक किया जाता है, तो उसके मूल गुणों में थोड़ा-बहुत फर्क आ ही जाता है.
HECS.in की रिपोर्ट के मुताबिक, 'एब्सोल्यूट प्योरिटी' यानी पूर्ण शुद्धता खाद्य विज्ञान में मौजूद नहीं है. यही वजह है कि अमेरिका का FDA हो या यूरोप का EFSA, 'शुद्ध' की जगह उत्पाद की 'सुरक्षा', 'गुणवत्ता' और उसके 'मानकीकरण' पर जोर देने लगी हैं.
फूड नेविगेटर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने खाद्य लेबलिंग में '100%' के भ्रामक दावों पर सख्त कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है.
तो क्या इस वजह से डिटोल 100% किटाणु नहीं मारता?
यह मार्केटिंग और विज्ञान के बीच के सबसे शानदार तालमेल का नमूना है. डिटॉल अपने किसी भी विज्ञापन में यह दावा नहीं करता कि वह दुनिया के सभी कीटाणुओं को 100% खत्म कर देता है. क्योंकि, ऐसा करना मेडिकल साइंस के नजरिए से गलत है. बैक्टीरिया, वायरस और फंगस की लाखों प्रजातियां हैं और हर सैनिटाइजर सब पर समान रूप से कारगर नहीं हो सकता.
0.1% की यही कमी एक कानूनी ढाल का काम करती है, ताकि अगर कोई व्यक्ति डिटॉल के इस्तेमाल के बाद भी बीमार पड़ता है, तो कंपनी झूठे विज्ञापन के आरोप से बच जाए. यह 'प्रीकॉशनरी प्रिंसिपल' कहलाता है, जो अब FMCG सेक्टर का अघोषित नियम बन चुका है.
भारत में कौन से प्रोडक्ट्स 100% शुद्धता का दावा नहीं करते?
भारत में कई प्रोडक्ट्स जानबूझकर इस दावे से बचते हैं. इसके पीछे ठोस वजहें भी हैं:
- डिटॉल: जैसा कि हमने बताया, यह '100% कीटाणु मारने' का नहीं, बल्कि '99.9% कीटाणुओं को मारने' का दावा करता है. इससे सभी तरह के रोगाणुओं पर कारगर न होने की कानूनी गुंजाइश बनी रहे.
- लाइफबॉय साबुन: यह भी डिटॉल की तर्ज पर 100% सुरक्षा की जगह 'बेहतर सुरक्षा' और 'कीटाणुओं से लड़ाई' का दावा करता है.
- पतंजलि आमला जूस: कंपनी इस पर कभी 100% शुद्ध नहीं लिखती, बल्कि 'कोई प्रिजर्वेटिव नहीं' और 'प्राकृतिक रूप से बना' जैसी सावधानी भरी भाषा लिखती है.
- मैगी नूडल्स: यह खुद को 100% आटे का बना न बताकर, 'आयरन और प्रोटीन का स्रोत' बताती है, क्योंकि इसमें मैदा, पाम ऑयल और कई फूड एडिटिव्स का मिश्रण साफ होता है.
- टाटा टी: चाय पत्ती के पैकेट पर 100% शुद्धता का दावा नहीं होता, बल्कि चाय की पत्तियों की 'मजबूती' और 'ताजगी' की बात की जाती है, क्योंकि चाय प्रोसेसिंग के दौरान कई चरणों से गुजरती है.
- कोका-कोला: यह कभी 100% प्राकृतिक या शुद्ध होने का दावा नहीं करता, बल्कि अपने एक सीक्रेट फॉर्मूले और एक जैसे स्वाद को अपनी पहचान बताता है.
- ब्रिटानिया ब्रेड: इसके पैकेट पर '100% शुद्ध गेहूं' नहीं, बल्कि 'विटामिन से भरपूर' और 'स्वस्थ विकल्प' लिखा होता है, क्योंकि इसमें ग्लूटेन, यीस्ट और इमल्सीफायर्स जैसे तत्व मौजूद होते हैं.
- एम.डी.एच. मसाले: कंपनी के पैकेट पर 'शुद्ध' शब्द तो हो सकता है, लेकिन '100% शुद्ध' नहीं, क्योंकि नमी और नमकीनपन को बनाए रखने के लिए एंटी-काकिंग एजेंट्स का इस्तेमाल जरूरी होता है.
- बोर्नविटा: यह खुद को 100% चॉकलेट या माल्ट का बना न बताकर, 'हेल्थ ड्रिंक' और 'पोषक तत्वों का मिश्रण' बताता है.
- रियल फ्रूट जूस: यह बोतल पर साफ-साफ लिखता है कि इसमें 'फ्रूट पल्प/कंसन्ट्रेट से बना' है. इसमें मिलाई गई चीनी और पानी की क्वांटिटी भी लिखता है, बजाय इसके कि यह 100% ताजे फलों का शुद्ध रस होने का दावा करे.

अगर 100% का झूठा दावा कर दिया तो क्या बिगड़ जाएगा?
यहीं पर आकर पूरे खेल का असली सार सामने आता है. जो कंपनियां सच्चाई को समझते हुए 100% शुद्धता के दावे से बचती हैं, वे एक बड़े संकट को टाल रही होती हैं. अगर कोई कंपनी यह झूठा दावा कर बैठती है, तो सबसे पहले उस पर उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत भ्रामक विज्ञापन का केस दर्ज हो सकता है.
FSSAI उस प्रोडक्ट की पूरी खेप को जब्त कर सकता है और भारी जुर्माना लगा सकता है. लेकिन सबसे बड़ा नुकसान होता है ब्रांड की विश्वसनीयता को. आज के सोशल मीडिया के दौर में, एक बार जब उपभोक्ता को लगा कि कंपनी ने उसे धोखा दिया, तो उस ब्रांड की सालों में बनी इमेज को गिरने में देर नहीं लगती.
यही समझदारी है कि कंपनियां 100% शुद्धता का भ्रम फैलाने की बजाय, अपनी पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी से उपभोक्ता का दिल जीतें. डाबर प्रकरण पूरे उद्योग के लिए एक बड़ी सीख है कि अब नियम सख्त हो गए हैं और उपभोक्ता पहले से ज्यादा जागरूक, ऐसे में खोखले दावों की जगह वैज्ञानिक सटीकता और कानूनी समझदारी ही ब्रांड को बचा सकती है.
Author : ज़ाहिद अहमद

