नई दिल्ली
भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने गुरुवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कामकाजी पेशेवरों की जगह लेने के बजाय उनकी वैल्यू बढ़ाता है। कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) द्वारा आयोजित GCC बिजनेस समिट में बोलते हुए, नागेश्वरन ने ऑटोमेशन को लेकर बढ़ती चिंताओं पर बात की और भारत के कैपेबिलिटी हब के बदलते स्वरूप के बारे में बताया।
CEA ने माना कि जहां रूटीन, बार-बार किए जाने वाले और नियमों पर आधारित कामों पर सस्ते ऑटोमेशन का खतरा है, वहीं अच्छी तरह से चल रहे सेंटर इंसानी भूमिकाओं को बेहतर बनाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सिस्टम को डिज़ाइन करने, ट्रेन करने, टेस्ट करने और उन्हें चलाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में इंसानी देखरेख की ज़रूरत होती है।
नागेश्वरन ने कहा, "इसलिए AI इन सेंटरों को खाली नहीं करता है। जो सेंटर अच्छी तरह से चल रहे हैं, वहां AI हर काम करने वाले व्यक्ति की वैल्यू बढ़ाता है। तो जोखिम तो है, लेकिन यह तय नहीं है कि ऐसा ही होगा। जो सेंटर एक ही जगह रुके रहेंगे, उन्हें नुकसान होगा। जो सेंटर आगे बढ़ेंगे, वे तरक्की करेंगे।" उन्होंने आगे कहा, "जो देश एक शक्तिशाली टेक्नोलॉजी को अपनी किस्मत मान लेता है, वह अंततः उसी के हिसाब से ढल जाता है। जो देश AI को एक टूल (औज़ार) मानता है, वह खुद उसे आकार देता है। भारत को दूसरे ग्रुप में होना चाहिए।"
CEA ने बताया कि भारत में अभी दुनिया के लगभग आधे GCC हैं, जिनमें 2,000 से ज़्यादा सेंटर शामिल हैं और इनमें 20 लाख से ज़्यादा पेशेवर काम करते हैं। इस सेक्टर का रेवेन्यू 60 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा हो गया है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 2 प्रतिशत का योगदान देता है। उन्होंने बताया कि इनमें से 1,200 से ज़्यादा सेंटर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग में एडवांस्ड काम करते हैं, जिससे भारत दुनिया भर में एंटरप्राइज़ AI टैलेंट बेस के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया है।
नागेश्वरन ने कहा कि ग्लोबल कंपनियां "पहले लागत (cost) के लिए भारत आईं। वे क्षमता (capability) के कारण यहां रुकीं। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। लागत का फायदा कोई दूसरा कम लागत वाला देश कॉपी कर सकता है। क्षमता का फायदा बनाना मुश्किल होता है और उसे खोना भी मुश्किल होता है।"
उन्होंने बताया कि ग्लोबल बैंक मुंबई और बेंगलुरु में ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म चलाते हैं, कार बनाने वाली कंपनियां चेन्नई और पुणे में एम्बेडेड सिस्टम डिज़ाइन करती हैं, और सेमीकंडक्टर कंपनियां स्थानीय स्तर पर चिप डिज़ाइन करती हैं। उन्होंने बैंगलोर में जर्मन कंपनी मर्क (Merck) के नए कैंपस का उदाहरण दिया, जहां कंपनी की दुनिया भर में सबसे ज़्यादा डिजिटल क्षमता मौजूद है, जिससे भारत उसका चौथा सबसे बड़ा वर्कफोर्स हब बन गया है। नागेश्वरन ने चेतावनी देते हुए कहा, "सफलता से कभी-कभी लोग लापरवाह हो सकते हैं। आज हमें जो बढ़त हासिल है, वह समय के साथ बनी है, लेकिन यह खत्म भी हो सकती है। दूसरे देश हमें देख रहे हैं और हमारी नकल कर रहे हैं। हमारी लागत बढ़ रही है। कुछ खास स्किल्स के मामले में हमारे टैलेंट की कमी पहले से ही है।"
CEA ने कहा कि "जो काम पहले सिर्फ़ सपोर्ट के तौर पर शुरू हुआ था, वह इंजीनियरिंग बन गया; जो इंजीनियरिंग से शुरू हुआ, वह प्रोडक्ट बन गया; और जो बैक-ऑफ़िस था, वह कई कंपनियों में ऐसी जगह बन गया है जहाँ अब ग्लोबल फ़ैसले लिए जाते हैं।"
उन्होंने बताया कि इसका फ़ायदा दोनों तरफ़ हुआ है। ग्लोबल कंपनियों को सही कीमत पर वर्ल्ड-क्लास काम मिला और भारतीय प्रोफ़ेशनल्स को ऐसे करियर मिले जिनकी "वे एक पीढ़ी पहले कल्पना भी नहीं कर सकते थे। आज GCC में मिलने वाली सैलरी पारंपरिक सर्विस जॉब्स की तुलना में अक्सर कहीं ज़्यादा होती है।"
नागेश्वरन ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, "हमारा मकसद कभी भी अपने लोगों से मशीनों की तरह काम करवाना नहीं होना चाहिए। हमारा मकसद मशीनों का इस्तेमाल इस तरह करना होना चाहिए कि हमारे लोग ऐसे काम करने के लिए आज़ाद हों जो सिर्फ़ इंसान ही कर सकते हैं - जैसे सोचना-समझना, फ़ैसले लेना, ज़िम्मेदारी उठाना और समझदारी से काम लेना।"

