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इतिहास का संकेत: हमेशा नहीं रहेगा डॉलर का वर्चस्व, लेकिन इसमें समय लगेगा

इतिहास का संकेत: हमेशा नहीं रहेगा डॉलर का वर्चस्व, लेकिन इसमें समय लगेगा

Awaz The Voice 1 week ago

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

कुछ मानकों के अनुसार चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका को पहले ही पीछे छोड़ चुका है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था एवं व्यापार में अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व अब भी बरकरार है।

यह स्थिति कब तक बनी रहेगी? बैरी आइशेनग्रीन की नयी पुस्तक 'मनी बियॉन्ड बॉर्डर्स' इतिहास के जरिये इस सवाल का जवाब तलाशती है।

आइशेनग्रीन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसर हैं और इस विषय पर पुस्तक लिखने के लिए पूरी तरह योग्य हैं।

प्राचीन यूनान से चला आ रहा है सिक्कों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार

अतीत में भी अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में आम तौर पर किसी एक मुद्रा का वर्चस्व रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यह स्थान अमेरिकी डॉलर के पास है।

आइशेनग्रीन ने अपनी पुस्तक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल हुए शुरुआती सिक्कों के इतिहास का अध्ययन किया है। इनमें एथेंस के 'आउल' सिक्के शामिल भी हैं। इन सिक्कों का वजन, शुद्धता और डिजाइन सदियों तक एक जैसा रहा जिससे मुद्रा में लोगों का भरोसा बढ़ा।

रोमन साम्राज्य की मुद्रा 'डिनेरियस' का इस्तेमाल विशाल रोमन साम्राज्य के बाहर भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में होता था। रोमन साम्राज्य का विस्तार करीब 117 ईस्वी में अपने चरम पर पहुंचा था।

इसके बाद पांचवीं शताब्दी ईस्वी तक बाइजेंटाइन साम्राज्य के सोने के सिक्के 'सॉलिडस' का इस्तेमाल ब्रिटेन से भारत तक व्यापार में किया जाता था।

यूरोप के पुनर्जागरण काल में फ्लोरेंस के यूरोपीय बैंकिंग और वित्तीय केंद्र बनने के साथ वहां का सोने का सिक्का 'फ्लोरिन' प्रमुख मुद्रा बन गया।

स्पेन की मुद्रा 'पीसेज ऑफ एट' पहली वास्तविक वैश्विक मुद्रा बनी। इसके आठ सिक्कों से एक पेसो बनता था इसलिए इन्हें 'पीसेज ऑफ एट' कहा जाता था। बाद में एम्स्टर्डम के वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार का केंद्र बनने और डच ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार के साथ डच गिल्डर का प्रभाव बढ़ा।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Awaz The Voice Hindi