आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली
पाकिस्तानी सेना के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के महानिदेशक मेजर जनरल अहमद शरीफ चौधरी के एक हालिया बयान ने नया कूटनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है। अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने अफगान और भारतीय लोगों के डीएनए को लेकर विवादित टिप्पणी की।
साथ ही धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए काफिर शब्द का प्रयोग किया। इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक गलियारों तक भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।
अहमद शरीफ चौधरी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि काफिरों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कुछ अफगान लोग खुद को भारत के लोगों से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि दोनों का डीएनए एक जैसा है। इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि अगर डीएनए एक है तो वे मुस्लिम कैसे हो सकते हैं।
इस तरह के बयान ने न सिर्फ पाकिस्तान के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। बलूचिस्तान में जारी भारी विरोध प्रदर्शनों और अशांति के पीछे बाहरी शक्तियों का हाथ होने का पुराना राग भी इस दौरान दोहराया गया।
सेना का कहना है कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर विदेशी ताकतों की नजर है। हालांकि जमीनी हकीकत यह बताती है कि वहां के नागरिक दशकों से सेना की बर्बरता और अधिकारों के हनन से परेशान हैं। यही वजह है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सरकार विरोधी जन-आंदोलन उग्र रूप ले चुके हैं।
अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार को लेकर भी पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता ने तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि अफगान शासन पूरी तरह से उग्रवाद और हिंसा पर निर्भर है। कभी तालिबान का खुलकर समर्थन करने वाला पाकिस्तान अब उसी तंत्र से परेशान नजर आ रहा है।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर लगातार झड़पें हो रही हैं। दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सेना अपनी अंदरूनी नाकामियों को छिपाने के लिए धार्मिक भावनाएं भड़काने का काम कर रही है।
देश इस समय भीषण आर्थिक संकट, महंगाई और आंतरिक विद्रोह से जूझ रहा है। जनता का ध्यान इन बुनियादी समस्याओं से भटकाने के लिए अक्सर भारत और धर्म से जुड़े विवादित मुद्दों को उठाया जाता है। अपनी छवि बचाने के लिए पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र ने विद्रोही समूहों को नए नाम भी दिए हैं।
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को फितना-अल-खवारिज और बलोच विद्रोहियों को फितना-अल-हिंदुस्तान कहा जा रहा है। इस तरह के नामकरण से सेना यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि देश के भीतर हो रही सभी हिंसात्मक घटनाएं विदेशी ताकतों से प्रेरित हैं।
सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी सेना के इस बयान की जमकर आलोचना की जा रही है। लोग मीम्स और पोस्ट के जरिए डीजी आईएसपीआर की खिंचाई कर रहे हैं। यूजर्स का कहना है कि जिस देश का निर्माण धार्मिक आधार पर हुआ, वहां के सैन्य अधिकारी इतिहास और भूगोल को भूलकर इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं।
भारत और अफगानिस्तान के इतिहास को जानने वाले लोगों ने याद दिलाया कि इस पूरे भूभाग का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ताना-बाना आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है।भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। लोगों ने पाकिस्तानी नेतृत्व की सोच पर सवाल उठाए।
कई विशेषज्ञों का कहना है कि एक तरफ पाकिस्तान वैश्विक मंचों पर वित्तीय मदद की गुहार लगाता है, वहीं दूसरी तरफ उसके सैन्य अधिकारी धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाले बयान देते हैं।चीन के साथ पाकिस्तान के नजदीकी रिश्तों पर भी तंज कसे जा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि पाकिस्तान अपनी सहूलियत के हिसाब से धार्मिक परिभाषाएं तय करता है। भारी कर्ज के बोझ तले दबा पाकिस्तान चीन के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलता, जबकि वहां भी कई आंतरिक मुद्दे मौजूद हैं। लेकिन भारत और अफगानिस्तान का नाम आते ही उसकी भाषा बदल जाती है।
पाकिस्तानी सेना के इस कदम से दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कूटनीतिक तनाव और बढ़ गया है। जानकारों के मुताबिक इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख को और धक्का पहुंचेगा। वैश्विक समुदाय अब पाकिस्तान के इस पुराने ढर्रे को अच्छी तरह समझने लगा है।

