नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को ताहिर हुसैन की अपील पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया। ताहिर हुसैन ने अंकित शर्मा मर्डर केस में अपनी सज़ा और दोषसिद्धि को चुनौती दी है। फरवरी 2020 में नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली दंगों के दौरान दयाल पुर इलाके में IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या कर दी गई थी।
उनका क्षत-विक्षत शव एक नाले से मिला था। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की डिवीज़न बेंच ने नोटिस जारी कर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा। ताहिर हुसैन की ओर से वकील राजीव मोहन और तारा नरूला पेश हुए। दिल्ली पुलिस की ओर से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) रजत नायर पेश हुए और नोटिस स्वीकार किया।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इस मामले में ताहिर हुसैन की कोई भूमिका नहीं है। पुलिस ने उन पर कोई खास भूमिका नहीं बताई है। उनके मामले की सुनवाई अलग से होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब हम सभी अपीलों की सुनवाई एक साथ पूरी कर लेंगे, तब हम आपकी अपील अलग से सुनेंगे। एक युवक की मौत हुई है; हम हर अपीलकर्ता की भूमिका का आकलन करेंगे। कड़कड़डूमा कोर्ट ने 31 जुलाई को ताहिर हुसैन और 4 अन्य लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। उन्हें 13 जुलाई को दोषी ठहराया गया था। यह अपील वकील राजीव मोहन, तारा नरूला, सोनल सारडा और शिवांगी शर्मा के ज़रिए दायर की गई है। अपीलकर्ता ताहिर हुसैन को IPC की धारा 188, धारा 153A के साथ धारा 149, धारा 147 के साथ धारा 149, धारा 148 के साथ धारा 149, धारा 365 के साथ धारा 149 और धारा 302 के साथ धारा 149 के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था।
बताया गया है कि कोर्ट ने ताहिर हुसैन को IPC की धारा 120B (आपराधिक साज़िश), IPC की धारा 505 (सार्वजनिक उपद्रव के लिए उकसाना) और IPC की धारा 109/114 (अपराध के लिए उकसाना और बढ़ावा देना) के तहत बरी कर दिया था, क्योंकि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ इन आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा था। अपील में कहा गया है कि ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से उसे सिर्फ़ 'विकेरियस लायबिलिटी' (यानी किसी और के काम के लिए ज़िम्मेदारी) के आधार पर (IPC की धारा 149 की मदद से) दोषी ठहराया। यह आरोप एक गैर-कानूनी भीड़ का सदस्य होने पर आधारित था, जिसने एक साझा मकसद के तहत अपराध किए थे, खासकर अंकित शर्मा की हत्या।
अपील में कहा गया है कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायत के मनगढ़ंत होने की बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। इसके अलावा, अपीलकर्ता को धारा 149 (गैर-कानूनी भीड़) के तहत दोषी ठहराने के लिए, ट्रायल कोर्ट ने 5 गवाहों - प्रदीप वर्मा, दीपक प्रधान, आकाश, भरत और प्रियंका गौर - पर भरोसा किया। आगे यह भी कहा गया है कि ट्रायल कोर्ट ने ताहिर हुसैन के बारे में विकल्प कोचर के बयान को गलत तरीके से नज़रअंदाज़ कर दिया, जबकि उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि उन्होंने उसे गैर-कानूनी भीड़ में नहीं देखा था। उस गवाह ने अंकित शर्मा की हत्या के बारे में विस्तार से बयान दिया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने भी बहुत ठोस और विश्वसनीय माना था।
याचिका में यह भी कहा गया है कि दीपक प्रधान और प्रियंका गौर अंकित शर्मा की हत्या के गवाह नहीं हैं, और इसलिए, इस मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है। इसके अलावा, दीपक प्रधान उस मंदिर परिसर के अंदर ही थे जहाँ वे आए थे; यह मंदिर घटना वाली जगह 'चांद बाग पुलिया' से दूर एक गली में था। प्रियंका गौर भी उसी गली में रहीं जहाँ उनका घर था। इसलिए, उनमें से कोई भी घटना या चांद बाग पुलिया पर हुई किसी भी चीज़ का गवाह नहीं हो सकता था। यह तर्क दिया गया है कि अपीलकर्ता को दोषी ठहराने वाला फैसला कानून के हिसाब से सही नहीं है, यह अटकलों और अनुमानों पर आधारित है, सबूतों से समर्थित नहीं है, और तथ्यों का गलत मूल्यांकन करता है।
सबूतों का विश्लेषण करते समय, ट्रायल कोर्ट यह ध्यान रखने में पूरी तरह नाकाम रहा कि आपराधिक मुकदमा एक ऐसी यात्रा की तरह है जिसमें सच का पता लगाना ही मकसद होता है। इसलिए, कोर्ट को अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए मनगढ़ंत और झूठे सबूतों पर विश्वास नहीं करना चाहिए था, जिन्हें सिर्फ़ अपीलकर्ता को फंसाने के मकसद से पेश किया गया था। कड़कड़डूमा कोर्ट ने 31 जुलाई को ताहिर हुसैन और 4 अन्य दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के दौरान दयाल पुर इलाके में हत्या हुई थी। उनकी बुरी तरह कटी-फटी लाश एक नाले से मिली थी।
अभियोजन पक्ष ने अपराध के दौरान की गई बर्बरता का हवाला देते हुए सभी दोषियों के लिए मौत की सज़ा की मांग की थी। यह भी बताया गया कि अपराध को अंजाम देने के लिए भारी धारदार हथियार का इस्तेमाल किया गया था। एडिशनल सेशंस जज (ASJ) ने हत्या के अपराध के लिए ताहिर हुसैन, नाज़िम, काशिम, जावेद और अनस को उम्रकैद की सज़ा सुनाई। कोर्ट ने ताहिर हुसैन पर 5 लाख रुपये और बाकी आरोपियों में से हर एक पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया। उन्हें अपहरण के अपराध के लिए भी 7 साल की सज़ा और जुर्माना लगाया गया। उन्हें दंगा करने जैसे अपराधों के लिए भी सज़ा सुनाई गई। स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) मधुकर पांडे ने मौत की सज़ा की मांग की और कहा कि ये दोषी बर्बर हैं। अपराध करते समय वे इंसान नहीं रह गए थे।

