Riley Moore on FCRA News: भारत जब भी अपने आंतरिक कानूनों को मजबूत करने और देश की सुरक्षा के लिए कड़ा कदम उठाता है, तो अक्सर सात समुद्र पार बैठे ठेकेदारों के पेट में मरोड़ उठने लगती है.
इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. दरअसल भारत सरकार जैसे ही देश में आने वाली विदेशी फंडिंग की निगरानी करने वाले कानून FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट को और सख्त बनाने जा रही है, वैसे ही अमरीकी गलियारों में जबर्दस्त खलबली मच गई है.
बड़ी बात ये है कि भारत के संसद में FCRA बिल में प्रस्तावित संशोधन के कयास के बीच अमरीका के सांसद भारत के खिलाफ सरेआम जहर उगलने पर उतारू हो गए हैं. आईए जानते हैं इसे विस्तार से आखिर FCRA नाम का क्या है भूत जिसने अमेरिका तक में सनसनी मचा राखी है.
ट्रंप की पार्टी के सांसद को क्यों लगी मिर्ची?(Riley Moore on FCRA)
बताते चलें कि डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के एक सांसद राइली मूर ने हाल ही में भारत में FCRA नियमों को कड़ा करने के प्रस्ताव पर अपनी भड़ास निकाली है. दरअसल मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक तीखा पोस्ट शेयर करते हुए भारत पर बेबुनियाद आरोप मढ़े.
उन्होंने लिखा कि भारत में ईसाई समुदाय का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन संसद FCRA बिल में ऐसे बदलाव कर रही है जिससे सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटीज का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की छूट मिल जाएगी. अमरीकी सांसद ने इसे सीधे तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बता दिया और गीदड़भभकी देते हुए चेतावनी दे डाली कि अगर यह बिल पास हुआ तो नई दिल्ली और वॉशिंगटन के द्विपक्षीय संबंधों पर गाज गिर सकती है.
आखिर क्या है FCRA?(FCRA Amendment India)
संसद के मौजूदा मानसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है. आसान शब्दों में समझें तो यह कानून तय करता है कि देश में काम कर रहे गैर-सरकारी संगठन यानि NGO, धार्मिक संस्थान, शैक्षणिक संस्थान और चैरिटेबल ट्रस्ट विदेशों से चंदा कैसे लेंगे और उस पैसे को कहां खर्च करेंगे.
वहीं कानून के मुताबिक हर ऐसे संगठन को गृह मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होता है, ताकि विदेशी पैसों के जरिए देश विरोधी गतिविधियों, धर्मांतरण या संदिग्ध एजेंडे को बढ़ावा न दिया जा सके.
अमरीका और NGO के पेट में क्यों हो रहा है दर्द?
दरअसल, भारत सरकार इस नए संशोधन (FCRA Amendment India) के जरिए विदेशी फंडिंग पर निर्भर रहने वाले संगठनों पर अपनी निगरानी और सख्त करना चाहती है. विवाद और डर इस बात का है कि यदि किसी धार्मिक संगठन या एनजीओ का रजिस्ट्रेशन 5 साल बाद रीन्यू (नवीनीकृत) नहीं होता है, तो उनके द्वारा संचालित स्कूल, अस्पताल या संपत्ति का नियंत्रण प्रशासनिक नियमों के दायरे में आ सकता है.
इसी पारदर्शी व्यवस्था और कड़े पहरे से विदेशी फंडिंग के दम पर अपनी दुकानें चलाने वाले संगठनों और उनके आका अमरीकी नेताओं में खलबली मची हुई है.
-भारत एक्सप्रेस

