Great Fire of London: 2 सितंबर 1666 को लंदन की गलियों में एक छोटी-सी चिंगारी ने ऐसी आग का रूप ले लिया, जिसने चार दिनों तक पूरे शहर को अपनी चपेट में रखा. 'ग्रेट फायर ऑफ लंदन' के नाम से जानी जाने वाली यह आपदा 2 सितंबर को शुरू हुई और 5 सितंबर तक जारी रही.
इस भयंकर आग ने न केवल इमारतों को राख किया, बल्कि शहर के चेहरे को हमेशा के लिए बदल दिया.
जलकर खाक हो गए हजारों घर
इस भयंकर आग में 13,200 मकान, 87 गिरिजाघर और प्रसिद्ध सेंट पॉल कैथेड्रल जलकर खाक हो गए. शहर की कुल आबादी लगभग 80,000 थी, जिसमें से करीब 70,000 लोग अपने घर गंवा बैठे. हजारों परिवार सड़क पर आ गए. लोग नावों में बैठकर टेम्स नदी पार करके जान बचाने की कोशिश करते दिखे. आग की लपटें इतनी तेज थीं कि शहर का तापमान 1700°C तक पहुंच गया था यह तापमान लोहे को पिघला देने के करीब होता है.
एक विनाश से प्लेग का हुआ अंत
दिलचस्प बात यह है कि इस विनाश ने एक और संकट का भी अंत कर दिया. इससे पहले के दो वर्षों में प्लेग (ब्लैक डेथ का एक रूप) शहर में 68,000 लोगों की जान ले चुका था. आग ने संक्रमित इलाकों और चूहों के ठिकानों को नष्ट कर दिया, जिससे प्लेग की महामारी भी थम गई.
पुडिंग लेन की बेकरी से हुई थी शुरुआत
यह आग पुडिंग लेन स्थित एक बेकरी से शुरू हुई मानी जाती है. उस समय लंदन की गलियां संकरी थीं और घर ज्यादातर लकड़ी के बने होते थे, इसलिए आग तेजी से फैली. आग बुझाने के आधुनिक साधन न होने के कारण लोग असहाय थे. कई दिनों तक शहर धुआं और राख से ढका रहा.
राख से उठा नया लंदन
ग्रेट फायर ऑफ लंदन सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक सबक भी है. इस त्रासदी के बाद लंदन का पुनर्निर्माण हुआ. नई इमारतें पत्थर और ईंट की बनीं, सड़कें चौड़ी की गईं और अग्नि सुरक्षा के नियम बनाए गए. आज भी यह घटना याद दिलाती है कि कैसे एक छोटी सी लापरवाही पूरे शहर को राख में बदल सकती है. जब लंदन राख में बदला, तो उसके साथ ही एक युग भी समाप्त हुआ और एक नया लंदन जन्म लेने लगा.
-भारत एक्सप्रेस

