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कोयला नहीं, सौर ऊर्जा से चमकेगी भारत की इकोनॉमी, मोदी सरकार के फैसलों ने दुनिया को दिखाया नया मॉडल

कोयला नहीं, सौर ऊर्जा से चमकेगी भारत की इकोनॉमी, मोदी सरकार के फैसलों ने दुनिया को दिखाया नया मॉडल

Modi Government Energy Policy: भारत औद्योगीकरण के लिए कोयले की जगह सौर ऊर्जा का उपयोग करने वाला पहला देश हो सकता है. देश की सौर ऊर्जा क्षमता करीब 40 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है और मार्च 2026 तक 150 गीगावाट के अधिक हो गई है.

यह जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई.

जलवायु और पर्यावरण केंद्रित अमेरिकी न्यूज पोर्टल ग्रिस्ट ने येल ई360 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत गुजरात के कच्छ के रेगिस्तान में फैले विशाल सौर पैनलों के कारण यह क्षेत्र तेजी से दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में से एक में परिवर्तित हो रहा है.

भारत-पाकिस्तान सीमा के पास लगभग 280 वर्ग मील में फैला खावड़ा सौर पार्क 2029 तक दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना बन सकता है.

एक बार पूरा होने पर, इस परियोजना में लगभग 6 करोड़ सौर पैनल लग जाएंगे और इससे 30 गीगावाट बिजली उत्पन्न होगी - जो ऑस्ट्रिया जितने बड़े देश को बिजली देने के लिए पर्याप्त है.

यह विशाल परियोजना सौर ऊर्जा की ओर भारत के बढ़ते कदम को दर्शाती है. देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता में प्रतिवर्ष लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और मार्च में यह 150 गीगावाट को पार कर गई.

जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हुए बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के उद्देश्य से भारत ने 2030 तक इस क्षमता को फिर से दोगुना करने का लक्ष्य रखा है.

ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक एम्बर के ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, भारत, चीन और पश्चिमी देशों से अलग राह पर चल रहा है, जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्थाओं का बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन पर टिकाया है.

बॉन्ड ने कहा कि चीन ने कोयले पर अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया और भारत सौर ऊर्जा पर निर्माण कर रहा है. उन्होंने आगे कहा कि भारत का मॉडल अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को प्रेरित कर सकता है जो कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि किए बिना तीव्र विकास की तलाश में हैं.

भारत का तेज सौर ऊर्जा विस्तार महज एक दशक पहले की स्थिति से एक नाटकीय बदलाव को दर्शाता है, जब देश के ऊर्जा मिश्रण में सौर ऊर्जा की भूमिका सीमित थी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय, जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती वैश्विक चिंताओं के बावजूद, सरकार ने औद्योगिक विकास को समर्थन देने के लिए कोयला उत्पादन का पुरजोर समर्थन किया था.

2014 में सत्ता में आने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 तक कोयला उत्पादन को दोगुना करने का संकल्प लिया था.

भारत ने यह तर्क देते हुए जलवायु शिखर सम्मेलनों में कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के अंतरराष्ट्रीय दबाव का विरोध किया कि विकासशील देशों को गरीबी कम करने और अपनी अर्थव्यवस्थाओं का विस्तार करने के लिए अभी भी जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता है.

हालांकि, सौर पैनलों की गिरती कीमतों और भारत की स्वाभाविक रूप से धूप वाली जलवायु ने धीरे-धीरे देश की ऊर्जा रणनीति को बदल दिया. ग्लासगो में हुए कॉप26 जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना में तीव्र गति आई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले वर्ष, भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का योगदान पहली बार आधे से अधिक रहा. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार, अब से 2030 के बीच भारत की अतिरिक्त बिजली मांग का लगभग आधा हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा होने की उम्मीद है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शेष एक चौथाई हिस्सा पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा सहित अन्य कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्रोतों से पूरा होने की संभावना है.

-भारत एक्सप्रेस

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