RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इंसान ने विज्ञान और तकनीक में अद्भुत प्रगति की है लेकिन उसका इस्तेमाल अक्सर विनाशकारी कामों के लिए किया गया. उन्होंने परमाणु ऊर्जा का उदाहरण देते हुए कहा कि सबसे पहले इसका उपयोग हथियार बनाने में हुआ, जबकि स्वच्छ ऊर्जा बाद में आई.
राष्ट्रीय प्रगति और वैश्विक नुकसान
भागवत ने चेतावनी दी कि कई बार किसी देश की तरक्की दूसरे देशों के नुकसान पर आधारित होती है. उन्होंने कहा कि अगर विकास का मॉडल दूसरों को नुकसान पहुंचाता है, तो वह टिकाऊ नहीं हो सकता.
व्यक्ति, समाज और प्रकृति का संतुलन
उन्होंने कहा कि मौजूदा मॉडल व्यक्ति की खुशी और समाज की भलाई को विरोधी मानते हैं. लेकिन भारत की परंपरा एक तीसरा रास्ता दिखाती है, जिसमें व्यक्ति, समाज और पर्यावरण बिना एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाए साथ आगे बढ़ सकते हैं.
विविधता में एकता का संदेश
भागवत ने कहा कि हिंदू पहचान किसी भाषा, पूजा पद्धति या जीवनशैली से परिभाषित नहीं होती. इसका मूल सिद्धांत विविधता का सम्मान और अस्तित्व की एकता को पहचानना है. उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता ने हमेशा विविधताओं में छिपी एकता को देखा है.
'पूरी दुनिया एक परिवार'
उन्होंने कहा कि धरती को 'अपना' और 'दूसरों का' मानकर नहीं बांटना चाहिए. पूरी दुनिया एक परिवार है और हर चीज दिव्य है. इसी भावना से सेवा और दया का भाव पैदा होता है.
भागवत ने भारतीयों से की अपील
भागवत ने विदेशों में बसे भारतीयों से अपील की कि वे जिस देश में रहते हैं, वहां ईमानदार और जिम्मेदार नागरिक बनें. साथ ही भारत के एकता, सेवा और मानवता के संदेश को दुनिया तक पहुंचाएं.
'ज्ञान बांटने की परंपरा'
उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा ज्ञान बांटा है, लेकिन कभी किसी देश पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की. गणित, आयुर्वेद और ज्योतिष जैसे ज्ञान भारत ने दुनिया को दिए. भारत ने महाशक्ति बनने की बजाय विश्व गुरु बनने का मार्ग चुना.
भागवत का पूरा संबोधन इस विचार पर केंद्रित था कि विविधता स्वाभाविक है और एकता ही असली सच्चाई है. उन्होंने कहा कि मानवता को भारतीय सोच से सीखना चाहिए कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं.
-भारत एक्सप्रेस

