Ali Khamenei Funeral: ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता के अंतिम विदाई कार्यक्रम को सिर्फ एक धार्मिक और भावनात्मक आयोजन नहीं माना जा रहा है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्यक्रम के जरिए ईरान ने मध्य पूर्व में अपने प्रभाव और सहयोगी संगठनों की मौजूदगी का भी संदेश देने की कोशिश की है.
खास बात यह रही कि इस कार्यक्रम में ईरान के कई क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए, जिसके बाद एक बार फिर "एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस" की चर्चा तेज हो गई. क्या है एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस? "एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस" एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल ईरान उन संगठनों और समूहों के लिए करता है जिन्हें वह अपना सहयोगी मानता है. इनमें फिलिस्तीन का हमास, लेबनान का हिज्बुल्लाह, यमन के हूती विद्रोही और इराक के कुछ सशस्त्र गुट शामिल बताए जाते हैं. अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने इन संगठनों में से कई को आतंकवादी संगठन घोषित किया है, जबकि ईरान इन्हें क्षेत्रीय प्रतिरोध का हिस्सा मानता है.
अंतिम विदाई में दिखी सहयोगी संगठनों की मौजूदगी
हाल के महीनों में हुए संघर्षों के बाद माना जा रहा था कि इन संगठनों की ताकत पहले के मुकाबले कमजोर हुई है. लेकिन अंतिम विदाई कार्यक्रम में इन समूहों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि वे अभी भी क्षेत्र में सक्रिय हैं और ईरान के साथ उनके संबंध बने हुए हैं.
विदेश मंत्री से भी हुई मुलाकात
कार्यक्रम के दौरान इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से भी मुलाकात की. इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है.
क्या यह राजनीतिक संदेश भी था?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आयोजन सिर्फ अंतिम विदाई तक सीमित नहीं था. इसे मध्य पूर्व की राजनीति के नजरिए से भी देखा जा रहा है. इजरायल और अमेरिका लंबे समय से दावा करते रहे हैं कि सैन्य अभियानों के कारण इन संगठनों की ताकत कमजोर हुई है. हालांकि, इस कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि ये समूह अभी भी सक्रिय हैं.
मध्य पूर्व में बना हुआ है तनाव
मध्य पूर्व में पिछले कई महीनों से लगातार संघर्ष और तनाव का माहौल है. ऐसे समय में ईरान के इस आयोजन को कई विश्लेषक एक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देख रहे हैं.
हालांकि, यह अलग-अलग विशेषज्ञों की व्याख्या है और इस पर सभी पक्षों की राय एक जैसी नहीं है. इतना जरूर है कि इस कार्यक्रम ने एक बार फिर मध्य पूर्व की बदलती राजनीति और ईरान की क्षेत्रीय भूमिका को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

