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असम का चाणक्य या भाजपा का संकटमोचक? कांग्रेस के 2 मुख्यमंत्रियों से सीखी सियासत, अब क्या फिर सजेगा हिमंत के सिर ताज!

असम का चाणक्य या भाजपा का संकटमोचक? कांग्रेस के 2 मुख्यमंत्रियों से सीखी सियासत, अब क्या फिर सजेगा हिमंत के सिर ताज!

Bhaskar Digital 2 weeks ago

गुवाहाटी : असम की राजनीति के क्षितिज पर इस समय एक ही नाम की गूंज है हिमंत बिस्व सरमा। कभी कांग्रेस के 'हनुमान' कहे जाने वाले हिमंत आज पूर्वोत्तर में भाजपा के सबसे बड़े 'शिल्पकार' बन चुके हैं।

असम विधानसभा चुनाव के रुझानों ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भाजपा राज्य में बहुमत का आंकड़ा पार कर सरकार बनाने जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या 2021 की तरह इस बार भी भाजपा हाईकमान अपने इस सबसे भरोसेमंद सिपहसालार के सिर पर ही मुख्यमंत्री का ताज रखेगा?

छात्र राजनीति से ‘पावर पॉलिटिक्स’ तक का सफर
1 फरवरी 1969 को जोरहाट में जन्मे हिमंत बिस्व सरमा का सियासी डीएनए छात्र राजनीति से तैयार हुआ है। प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज के छात्र संघ में तीन बार महासचिव रहने वाले हिमंत ने वकालत और पीएचडी की डिग्री भी हासिल की। उनकी वाकपटुता ऐसी थी कि 18 साल की उम्र में उन्होंने तत्कालीन पीएम राजीव गांधी से मुलाकात कर स्टेडियम के लिए फंड मंजूर करवा लिया था। वकालत छोड़कर राजनीति में आए हिमंत ने जल्द ही मुख्यधारा की राजनीति में अपनी धाक जमा ली।

हितेश्वर सैकिया की पारखी नजर और तरुण गोगोई का भरोसा
हिमंत बिस्व सरमा की असली सियासी समझ कांग्रेस के दो दिग्गज मुख्यमंत्रियों के सानिध्य में विकसित हुई। हितेश्वर सैकिया ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें युवाओं को कांग्रेस से जोड़ने की जिम्मेदारी दी। इसके बाद तरुण गोगोई के कार्यकाल (2002-2014) में हिमंत राज्य के सबसे शक्तिशाली मंत्री बनकर उभरे। शिक्षा और स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने राज्य में मेडिकल कॉलेजों का जाल बिछा दिया। वे गोगोई के इतने खास थे कि पार्टी के हर चुनावी संकट का समाधान उन्हीं के पास होता था।

‘पिदी’ और राहुल गांधी: वह मोड़ जहां से बदल गई असम की किस्मत
कांग्रेस में शीर्ष पर रहने वाले हिमंत का मोहभंग 2014 के करीब शुरू हुआ। जब तरुण गोगोई ने अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ाना शुरू किया, तो हिमंत बागी हो गए। सरमा अक्सर एक किस्सा सुनाते हैं कि जब वे राहुल गांधी से मिलने दिल्ली गए, तो राहुल उनकी बात सुनने के बजाय अपने पालतू कुत्ते ‘पिदी’ को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे। अपमान का यह कड़वा घूंट हिमंत के लिए कांग्रेस छोड़ने की वजह बना और अगस्त 2015 में उन्होंने अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा का दामन थाम लिया।

भाजपा का ‘संकटमोचक’ और पूर्वोत्तर का किंगमेकर
भाजपा में आते ही हिमंत ने अपनी उपयोगिता साबित कर दी। 2016 में असम में पहली बार भाजपा की सरकार बनाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही। उन्हें ‘नेडा’ (NEDA) का संयोजक बनाया गया और उन्होंने मणिपुर, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में भी भाजपा के गठबंधन की सरकारें बनवा दीं। उनकी रणनीतिक कुशलता का ही परिणाम था कि 2021 में पार्टी ने निवर्तमान सीएम सर्वानंद सोनोवाल की जगह एक ‘बाहरी’ (कांग्रेस से आए) नेता हिमंत को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी।

हिंदुत्व का नया चेहरा और ‘मामा’ की लोकप्रियता
मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमंत ने खुद को कट्टर हिंदुत्व के सांचे में ढाल लिया। गोहत्या विरोधी कानून, सरकारी मदरसों को बंद करना और ‘मियां’ मुसलमानों के खिलाफ सख्त स्टैंड ने उन्हें भाजपा के कोर वोट बैंक का चहेता बना दिया। वहीं, दूसरी ओर जनता के बीच वे ‘मामा’ और ‘दादा’ के रूप में लोकप्रिय हैं। महाराष्ट्र में उद्धव सरकार गिराने के दौरान बागी विधायकों का गुवाहाटी में प्रबंधन हो या राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को घेरना, हिमंत आज अमित शाह के सबसे भरोसेमंद सिपाही बनकर उभरे हैं।

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