नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली शहर में करीबन (7) जिले में अदालते है। बता दें कि दिल्ली की साकेत कोर्ट , पटियाला हाउस कोर्ट, कड़कड़डूमा कोर्ट , राउज ˈऐव़न्यू कोर्ट, तीस हज़ारी कोर्ट, द्वारका कोर्ट और रोहिणी कोर्ट में आज हजारों की तादात में वकील प्रैक्टिस करते हैं।
साथ ही लाखों केस पेंडिंग हैं, लेकिन आज हड़ताल के संदर्भ में बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के सदस्य एडवोकेट वीरेंद्र कुमार झा और कड़कड़डुमा कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट कुनाल कुमार ने बताया कि हड़ताल 2 मुख्य मुद्दों को लेकर की गई है। बता दें कि सिविल मामलों की आर्थिक क्षेत्राधिकार बढ़ाने की मांग है।
वर्तमान में दिल्ली की जिला अदालतों में वही सिविल मुकदमे दाखिल किए जा सकते हैं, जिन संपत्तियों की कीमत (2) करोड़ रुपये तक है। इससे अधिक मूल्य के मामलों को केवल दिल्ली हाईकोर्ट में ही दाखिल किया जा सकता है। यह सीमा पहले बीस लाख रुपये थी, जिसे 26 अक्टूबर 2015 को बढ़ाकर (2) करोड़ रुपये किया गया था। बता दें कि करीबन ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं। इस अवधि में दिल्ली में संपत्तियों के मूल्य कई गुना बढ़ चुके हैं। इसलिए हमारी मांग है कि यह सीमा (2) करोड़ से बढ़ाकर बीस करोड़ रुपये की जाए, ताकि बीस करोड़ तक के दीवानी मुकदमे जिला अदालतों में ही दाखिल हो सकें,
बता दें कि हाईकोर्ट के निर्णयों में जिला अदालत प्रतिनिधियों की भागीदारी, जब भी दिल्ली हाईकोर्ट वकीलों से संबंधित कोई निर्णय लेती है। साथ ही चैंबर निर्माण, कोर्टरूम विस्तार, लाइब्रेरी सुविधाएँ या अन्य व्यवस्थाएँ, तो जिला अदालतों के चुने हुए प्रतिनिधियों को भी इसमें सम्मिलित किया जाना चाहिए। हाल के समय में यह देखा गया है कि जिला अदालतों के प्रतिनिधियों को इन निर्णयों की जानकारी तक नहीं दी जाती, न ही उनसे कोई राय ली जाती है। यह स्थिति उचित नहीं है, इसमें सुधार आवश्यक है, उन्होंने बताया कि हमारी ये मांगें केवल वकीलों के लिए ही नहीं हैं, बल्कि उन लाखों लिटिगेंट्स के लिए भी हैं, जो न्याय आपके द्वार की उम्मीद के साथ अदालतों में आते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट पर पहले ही मुकदमों का अत्यधिक बोझ है, जिसके कारण कई बार सुनवाई की तारीखें बढ़ती रहती हैं और मामलों में देरी होती है। वहीं जिला अदालतों में आज पर्याप्त न्यायिक अधिकारी, कोर्टरूम और आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिससे मामलों का निपटारा अधिक आसानी से हो सकता है। इसी बीच जस्टिस एट डोरस्टेप की भावना तभी सार्थक होगी, जब बीस करोड़ रुपये तक के दीवानी मुकदमे जिला अदालतों में ही दाखिल किए जाए.

