- गौतमबुद्ध नगर के कॉलेज की पुरा छात्राओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को राजभवन से ऑनलाइन संबोधित
- ‘मासिक धर्म स्वच्छता’ को जन-आंदोलन बनाने का आह्वान
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि मासिक धर्म कोई बीमारी या कमजोरी नहीं, बल्कि नारीत्व की एक स्वाभाविक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
इसे लेकर समाज में व्याप्त चुप्पी, शर्म और भ्रांतियों को समाप्त करना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
राज्यपाल ने आह्वान किया कि जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान और उज्ज्वला योजना देश में जन-आंदोलन बने, उसी प्रकार अब 'मासिक धर्म स्वच्छता' को भी एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन बनाने की आवश्यकता है।
राज्यपाल शुक्रवार को कु. मायावती राजकीय महिला पीजी कॉलेज (बादलपुर, गौतमबुद्ध नगर) के जंतु विज्ञान विभाग की पुरा छात्राओं (एल्युमिनाई) द्वारा ‘विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस’ के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को राजभवन से ऑनलाइन संबोधित कर रही थीं। इस वर्ष के केंद्रीय विषय (थीम) "टूगेदर फॉर ए पीरियड फ्रेंडली वर्ल्ड" को रेखांकित करते हुए उन्होंने एक ऐसे संवेदनशील समाज के निर्माण पर जोर दिया जहाँ प्रत्येक महिला को सही जानकारी, सम्मान और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ हों।
परंपरा से हटकर एल्युमिनाई का नेतृत्व सराहनीय
राज्यपाल ने सम्मेलन के प्रारूप की सराहना करते हुए कहा कि सामान्यतः शैक्षणिक संगोष्ठियां संस्थानों और शिक्षकों के नेतृत्व में होती हैं, जहाँ पूर्व छात्रों की भूमिका सहयोगी तक सीमित रहती है। परंतु, इस कॉलेज की पुरा छात्राओं द्वारा गुरुजनों के मार्गदर्शन में स्वयं आगे बढ़कर इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का नेतृत्व करना शैक्षणिक जगत में एक सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन और नवचेतना का संकेत है। उन्होंने युवा बेटियों के इस साहस और विजन की विशेष प्रशंसा की।
बेटियों को डर नहीं, सही जानकारी और सम्मान दें
समाज की रूढ़िवादी सोच पर चिंता व्यक्त करते हुए राज्यपाल ने कहा कि आधुनिक और शिक्षित होने का दावा करने वाला समाज भी आज इस विषय पर खुलकर बात करने में झिझकता है।
उन्होंने कहा, आज भी जब कोई बेटी पहली बार इस शारीरिक प्रक्रिया से गुजरती है, तो उसे वैज्ञानिक जानकारी देने के बजाय समाज और परिवार द्वारा डर और झिझक का माहौल दिया जाता है। यहां तक कि मेडिकल स्टोर से सैनिटरी नैपकिन को काले पॉलीबैग में छिपाकर देना हमारी सामाजिक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है। इस मानसिकता को बदलने की शुरुआत हमें अपने घरों से करनी होगी।
उन्होंने एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि लगभग 48 प्रतिशत किशोरियों को अपने पहले मासिक धर्म से पूर्व इसके बारे में कोई बुनियादी जानकारी नहीं होती, जो कि बेहद चिंताजनक है। साथ ही, स्कूलों में स्वच्छ शौचालय और मासिक धर्म उत्पादों की कमी के कारण देश में हर साल लाखों लड़कियों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है।
बेटों को भी दी जाए इसकी वैज्ञानिक शिक्षा
आनंदीबेन पटेल ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए सुझाव दिया कि मासिक धर्म की वैज्ञानिक और व्यावहारिक शिक्षा केवल बेटियों तक सीमित न रहे, बल्कि स्कूलों में लड़कों (बेटों) को भी इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब लड़के इस विषय के प्रति संवेदनशील और समझदार बनेंगे, तभी समाज से गलतफहमियां, संकोच और टीजिंग (चिढ़ाना) जैसी कुप्रथाएं पूरी तरह समाप्त हो सकेंगी। उन्होंने प्राथमिक स्तर पर कक्षा 4 और 5 से ही बच्चों में इसके प्रति बुनियादी समझ विकसित करने की आवश्यकता बताई।
वैश्विक परिदृश्य की चर्चा करते हुए राज्यपाल ने बताया कि जी-7 देशों (जैसे स्कॉटलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा) में मासिक धर्म उत्पादों को ‘आवश्यक स्वास्थ्य उत्पाद’ मानकर टैक्स-फ्री किया गया है और स्कूलों में यह निःशुल्क उपलब्ध हैं। उन्होंने जापान में महिलाओं के स्वास्थ्य ट्रैकिंग के लिए उपयोग की जा रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीकों का भी उदाहरण दिया।
भारत के संदर्भ में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के 30 जनवरी 2026 के ऐतिहासिक निर्णय को एक ‘सांस्कृतिक क्रांति’ बताया, जिसके तहत मासिक धर्म स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग माना गया है। इस आदेश के बाद अब स्कूलों में कक्षा 6 से ऊपर की छात्राओं को निःशुल्क बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड, स्वच्छ जल और सुरक्षित डिस्पोजल व्यवस्था सुनिश्चित करना अनिवार्य हो गया है।
केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं
राज्यपाल ने भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का विवरण साझा किया। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ‘मासिक धर्म स्वच्छता योजना’, ‘राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम’, जनऔषधि केंद्रों पर मिलने वाले किफायती ‘सुविधा’ सैनिटरी नैपकिन और समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों में इंसिनेरेटर्स (पैड नष्ट करने वाली मशीनें) की स्थापना।
सरकारी स्कूलों में छात्राओं को निःशुल्क सैनिटरी नैपकिन का वितरण, ‘किशोरी बालिका योजना’ और ‘वन स्टॉप सेंटर’ के माध्यम से परामर्श। इसके अलावा, महिला स्वयं सहायता समूहों को नैपकिन निर्माण से जोड़कर स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और ‘पिंक टॉयलेट्स’ में वेंडिंग मशीनें लगाने पर विशेष बल दिया जा रहा है।
संबोधन के अंत में राज्यपाल ने किशोरियों के लिए संतुलित आहार, आयरन और कैल्शियम युक्त पोषण की उपलब्धता को अनिवार्य बताया। उन्होंने स्थानीय निकायों, विश्वविद्यालयों और समाज के सभी वर्गों से अपील की कि वे इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाएं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस सम्मेलन से निकले वैज्ञानिक निष्कर्ष और नीतिगत सुझाव शासन और संबंधित विभागों तक पहुंचेंगे, जो भविष्य की कार्ययोजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध होंगे।

