आज 24 सितंबर 2026 को महात्मा ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज की स्थापना को आज 153 साल हो रहे हैं. और इसी वर्ष से ज्योतिबा फुले जी की 200 वी जयंती की शुरुआत भी हुई है. ज्योतिबा फुले की अंग्रेजी शालांत परीक्षा तक की पढ़ाई हुईं थी.
इस वजह से उन्होंने अपने शिक्षा के दौरान ही ब्रिटिश शासन काल में विक्टोरियन युग (Victorian Era) की उदारमतवादी और तार्किक विचारधारा से प्रभावित होकर पश्चिमी देशों के समानता के विचारों, तर्कवाद और थाॅमस पेन की पुस्तक (द राइट्स आफ मेन (The Rights of Men) और जाॅन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) के स्वतंत्रता और व्यक्तीगत अधिकारो से जुड़े विचारो से बहुत अधिक प्रभावीत होने की वजह से, मिल के तार्किक और समतावादी दृष्टीकोण ने ज्योतिबा फुले को भारतीय जाति व्यवस्था की रुढियों के खिलाफ काम करने तथा लिखने के लिए बौध्दिक हथियार मिला है. और जाॅर्ज वाशिंग्टन अमेरिकि स्वतंत्रता संग्राम के महानायक की गुलामी विरोधी (Anti Slavery Movement) इतिहास और लेखों का बहुत गहराई से अध्ययन करने की वजह से ही ज्योतिबा फुले ने (1 जून 1873) 'गुलामगिरी' (Slavery) किताब का लेखन किया है . और उन अमेरिकि अश्वेत दासों को किताब को अर्पण किया है. अन्य उच्चविद्याविभूषित लोगों की तुलना में अपने कामकाज की अंग्रेजी पढ़ाई के बावजूद उन्निसवी शताब्दी की शुरुआत में ही अंग्रेजों से भिमाकोरेगांव की लड़ाई मे ( 1 जनवरी 1818) पेशवाओ की हार होने के 9 साल बाद 11 अप्रैल 1827 को पैदा हूऐ, ज्योति ने अपने नाम के अनुसार ही समता की ज्योति जलाने का एतिहासिक कार्य शुरू किया था.
पेशवाओ के 105 सालों के (1713 से 1818) राज में स्रि - शुद्रों की स्थिति मनुस्मृति के चातुर्वर्ण्य के अनुसार अमानवीय स्थिति मे चल रही थी. जिसको देखकर पिछड़ी माली (Gardner) जाति मे पैदा हूऐ, ज्योतिबा फुले ने भारत में पहले से ही चल रहे विषमता मुलक समाज में समता के लिए अपने 63 सालों की जिंदगी में लेखन करने से लेकर, स्त्रि-शुद्रो के लिए स्कूल शुरू करने से लेकर ब्राम्हण विधवाओं के केशवपन की प्रथा के खिलाफ तथा दलितों के लिए अपने खुद के घर के पानी के हौद को खुला करने से लेकर किसानो की और शिक्षा की समस्याओं का समाधान करने के लिए, हंटर कमिशन को 19 अक्तुबर 1882 को अपना रिपोर्ट प्रस्तुत करने करने का क्रांतिकारी कार्य संपन्न किया है.
उसी क्रांतिकारी क्रम में आज 24 सितंबर 1873 के दिन ही सत्यशोधक समाज की स्थापना शूद्रों, अतिशूद्रो (दलित) महिलाओं को सामाजिक अधिकार दिलाने तथा समाज में व्याप्त असमानता को खत्म करने के लिए की थी. सत्यशोधक समाज महात्मा ज्योतिबा फुले जी की समतामूलक समाज बनाने के लिए उनके द्वारा स्थापित किया गया सामाजिक परिवर्तन के लिए संघठित प्रयास था. जिसे स्थापित करने को लेकर आज 153 साल पूरे हो रहे हैं. यह प्रयास भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के स्थापना (1885) से भी 12 साल पहले की क्रांतिकारी पहल है.
19 वी शताब्दी को भारतीय पुनर्जागरण, (Renaissance) का युग कहां जाता है. इसके परिणाम स्वरूप धार्मिक कट्टरता और सामाजिक अनुदारता के स्थान पर उदारता वाद का बोलबाला शुरू हुआ. महाराष्ट्र में यह उदारतावाद समाज के उच्चतर वर्ग तक ही सीमित था. उसे समाज के निम्न वर्गो तक ले जाने वाले सर्वप्रथम महात्मा ज्योतिबा फुले (1827 - 1890) का ही नाम आता है.
ज्योतिबा फुले जी के जीवन का टर्निंग पाइंट. एक बार वह अपने ब्राम्हण मित्र के आग्रह पर उसकी बारात में शामिल हूए. वहाँ जात्याभिमानी ब्राम्हणों ने एक पिछड़े वर्ग के आदमी को ब्राम्हणों की बारात में शामिल होने पर आपत्ति करते हूऐ, उन्हें भला-बुरा कहां और इस घटना से अपमानित होने के बाद, उनके भावी जीवन का लक्ष्य निर्धारित हो गया. और वह इस नतिजे पर पहुंच गए, कि हिंदू समाज के पतन का मूल कारण ब्राम्हणवाद है. जो ब्राम्हण को श्रेष्ठ और शुद्रों को निकृष्ट मानता है. जो मानवीय असमानता का दर्शन है. इस एकांगी और अमानवीय कुव्यवस्था एवं जातियवादी दुश्तेना के विरुद्ध उन्होंने अपनी इसके बाद का संपूर्ण जीवन निर्ममतापूर्वक शंखनाद करते हूऐ अर्पित किया है.
महात्मा ज्योतिबा फुले जी का जातिनिर्मूलन का कार्य. इस उद्देश्य से मानव - जीवन मे शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका को अपनी दूरदर्शिता से उन्होंने ब्राम्हणेतर जातियों के लड़के - लड़कियों के लिए (1848) को पुणे में स्कूलों की शुरुआत करते हूऐ, इसके तीन साल पश्चात अछूतों के लिए स्कूल खोलकर इन स्कूलों में वह खुद तथा उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले तथा उनके मुस्लिम मित्र उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख ने शिक्षकोंकी भुमिका को निभाने का ऐतिहासिक कार्य किया है. संपूर्ण भारत में स्रि - शुद्रो के लिए स्कूल शुरू करने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले तथा फातिमा शेख ही थे. और इसके लिए उन्हें काफी किमत भी चुकानी पडी है. अपने सपनों का समतामूलक समाज बनाने के लिए ही उन्होंने 24 सितंबर 1874 के दिन सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी.
जिसके मुख्य उद्देश्य थे - एकेश्वरवाद, पुरोहितवाद का विरोध, किसी भी ग्रंथ को प्रमाणभूत न मानना, मूर्तिपूजा और तिर्थयात्रा का निषेध, मानवजाती की समानता, बंधुता और स्वतंत्रता को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मनाना.
'सत्यशोधक समाज'सत्यशोधक समाज के स्थापना के मुख्य उद्देश्य : (1) ब्राम्हणवादी वर्चस्व को चुन्नौती : धार्मिक और सामाजिक जीवन पर उच्च जातियों और ब्राम्हण पुरोहित वर्ग के वर्चस्व को चुनौती देना इस संस्था का प्रमुख लक्ष्य था. उन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ब्राम्हण पुरोहितों की अनिवार्यता को खत्म करने के लिए सत्यशोधक समाज के द्वारा प्रयास किया. (2) ज्योतिबा फुले समाज में फैली छुआछूत जैसी अमानवीय सामाजिक बुराई को और ऊंच- नीच के भेदभाव को जड़ से खत्म करना चाहते थे. वे मनुष्य की स्वतंत्रता और समानता के पक्षधर थे. (3) शिक्षा का प्रसार :ज्योतिबा फुले का मानना था कि अज्ञानता और शिक्षा की कमी ही शोषितों की गुलामी का सबसे बड़ा कारण है. इसलिए वंचित समुहो और महिलाओं को शिक्षित करना और उन्हें बौध्दिक रुप से स्वतंत्र बनाना सत्यशोधक समाज का मुख्य लक्ष्य था. (4) वंचितों और किसानों का अधिकार : शूद्रों और किसानों और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना तथा उन्हें सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाना था ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सके. (5) संगठित आंदोलन : ज्योतिबा फुले समझ चुके थे कि सदियों से चली आ रही उंच - निच की परंपरा और शोषण के विरुद्ध लडने के लिए, शोषितों का एक संघठित मंच और सामुहिक कार्रवाई बेहद जरूरी है. इसलिए उन्होंने 24 सितंबर 1874 को 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की थी.
सत्यशोधक समाज का वर्तमान स्वरुप का मुल्यांकन इस कारण उन्हे आधुनिक भारत की परिकल्पना का पहला रचनाकार भी माना जाता है. इसलिए डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने बुद्ध और कबीर के साथ ज्योतिबा फुले को अपना गुरु माना था.और अपनी ऐतिहासिक किताब (1946) 'शूद्र कौन थे ?' - (Who Were the Shudras ? ) महात्मा ज्योतिबा फुले जी को अर्पित करते हूऐ, उनके प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया है.
ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज की स्थापना यह आजसे 153 सालों पहले की बहुत बड़ी पहल थी. जिससे पिछड़े वर्ग के लोगों मे आत्मविश्वास पैदा होकर अस्पृश्यता- निवारण आंदोलन की शुरुआत हुई थी. संक्षेप में महाराष्ट्र में नारी शिक्षा, अस्पृश्यता- निवारण का आंदोलन , किसानों और मजदूरों मे जागृती, और ब्राम्हणेतर आंदोलन के जन्मदाता महात्मा ज्योतिबा फुले ही थे. क्योंकि मै खुद महाराष्ट्र के धूलिया जिले के एक छोटे से गाँव में पैदा हुआ हूँ. जो गाँव महात्मा ज्योतिबा फुले जी की प्रेरणा से ही सत्यशोधक गाँव था. इस कारण हमारे गाँव में ब्राम्हणों की कोई भुमिका नहीं थी. यहां तक कि हमारे गाँव के मंदिरों से मुर्तियां हटाकर वहाँ पर स्कूल चलाएँ गए है. जिसमें मेरी खुद की पढ़ाई हुईं हैं. (1957) और शादी - ब्याह मे ज्योतिबा फुले जी के द्वारा रचित मंगलाष्टके को गाते हूए, किसी भी जाति का व्यक्ति जो ठीक गांकर सुना सकते हो. उनके द्वारा विवाह विधी संपन्न होता था.
लेकिन आज 153 सालों के बाद पिछे मुडकर देखने से उनके बाद के अनुयायीयों ने चुनाव को नजर के सामने देखते हूऐ, उनके दर्शन को आत्मसात करने मे चुनावों के हिसाब से सुविधाजनक चतुराई करते हूऐ, सिर्फ ब्राम्हण - ब्राम्हणेतर वाद को ध्यान में रखते हुए, ही पूरी राजनीति उसके केंद्र बिंदु पर लाकर खडी कर दी है. आज सभी जातियों के अपने - अपने गिरोहों मे रुपांतर किया जा रहा है. जो महात्मा ज्योतिबा फुले जी के जातिनिर्मूलन दर्शन को नजरअंदाज करते हूऐ, उन्हें पूरी तरह से भूलाकर उनके दर्शन को बहुत ही बेशर्मी से धोखा दिया जा रहा है. ब्राम्हणेतरो का आंदोलन चलाने का महात्मा ज्योतिबा फुले का वास्तविक उद्देश्य था - सब ब्राम्हणेतरो को एक समान धरातल पर खडे करना. परंतु इन ब्राम्हणेतरो का एकमात्र उद्देश्य सभी ब्राम्हणों से घृणा करना बन गया है. तो दुसरी तरफ अछूतों से उसी तरह से परहेज करना जैसे सदियों से तथाकथित सवर्ण जातियों के लोग करते हुए आ रहे है .महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी दलित अत्याचार की घटनाओं का मैने खुद तीन- तीन बार जाकर निरिक्षण करने के बाद नागपुर की सभा में उपस्थित सभी परिवर्तनवादी आंदोलनकारी साथियों के सामने उपरिलिखित बातों को कहां था. क्योंकि खैरलांजी के अत्याचारों मे शामिल सभी अपराधी ओबीसी समाज के थे . यहाँ तक कि खैरलांजी के ग्रामपंचायत के तत्कालीन सरपंच आदिवासी गोंड आदिवासी थे. और सबसे हैरानी की बात उस क्षेत्र के भाजपा के विधायक ने अपने ओबीसी व्होटबैंक के मतदाताओं को खुष करने के लिए, अपराधीयों के समर्थन में धरना- प्रदर्शन भी किया था. जिस वजह से विधायक महोदय को दलित अट्रासिटी एक्ट के तहत गिरफ़्तार भी किया गया था . वर्तमान समय मे भारत का संपूर्ण चुनाव ग्रामपंचायत से लेकर संसद तक सिर्फ धर्म और जातिवाद के केंद्र में चल रहा है. क्या यह 153 साल पहले महात्मा ज्योतिबा फुले जी के 'सत्यशोधक समाज' के स्थापना के उद्देश्य से कोई मेल खाता हुआ दिखाई दे रहा है ?
Adv from Sponsors

