केंद्र सरकार ने अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर चल रहे विवाद के बीच बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने फिल्म को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत गठित इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) के पास विस्तृत जांच और समीक्षा के लिए भेज दिया है।
यह फैसला फिल्म के ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से रिलीज़ के महज 48 घंटे के भीतर हटाए जाने के बाद लिया गया है।
फिल्म को पहले ‘पंजाब ’95’ नाम से तैयार किया गया था, लेकिन लंबे समय तक सेंसर संबंधी विवादों में फंसे रहने के बाद इसे नए नाम ‘सतलुज’ के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ किया गया। हालांकि रिलीज़ के दो दिन बाद ही इसे सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। अब सरकार ने मामले की औपचारिक जांच शुरू कर दी है, जिससे एक बार फिर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।
IDC करेगी फिल्म की विस्तृत समीक्षा
सरकारी सूत्रों के अनुसार, इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी फिल्म की पूरी सामग्री का परीक्षण करेगी और यह जांचेगी कि क्या फिल्म सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के तहत निर्धारित डिजिटल मीडिया आचार संहिता का पालन करती है या नहीं। समिति अपनी रिपोर्ट सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
IDC विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों के प्रतिनिधियों से मिलकर बनी एक वैधानिक समिति है। इसमें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय के अधिकारी शामिल होते हैं। आवश्यकता पड़ने पर विषय विशेषज्ञों को भी समिति के समक्ष बुलाया जा सकता है।
यदि जांच के दौरान किसी प्रकार का उल्लंघन पाया जाता है तो समिति चेतावनी जारी करने, डिस्क्लेमर जोड़ने, सामग्री में संशोधन कराने, पुनर्वर्गीकरण करने, सार्वजनिक माफी मांगने अथवा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने जैसी सिफारिशें कर सकती है।
आखिर ZEE5 से क्यों हटाई गई ‘सतलुज’?
फिल्म को हटाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि निर्माताओं ने इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उस रूप में जारी किया, जिसमें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा पहले सुझाए गए संशोधनों को शामिल नहीं किया गया था।
दरअसल, फिल्म जब ‘पंजाब ’95’ शीर्षक से थिएटर में रिलीज़ के लिए भेजी गई थी, तब CBFC ने कई कट और बदलाव सुझाए थे। बाद में निर्माताओं ने इसे थिएटर की बजाय सीधे ओटीटी पर रिलीज़ करने का फैसला किया। यद्यपि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए CBFC प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं होता, लेकिन वे सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के तहत लागू डिजिटल मीडिया आचार संहिता के दायरे में आती हैं।
सरकारी अधिकारियों का मानना है कि फिल्म में ऐसे विषय शामिल हैं जिनका संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और देश की संप्रभुता जैसे संवेदनशील मुद्दों से हो सकता है। इसी आधार पर फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटाने के निर्देश दिए गए।
इस कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। एक वर्ग ने इसे रचनात्मक स्वतंत्रता पर अंकुश बताया, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि ऐतिहासिक और संवेदनशील घटनाओं पर आधारित फिल्मों को कानूनी और नियामकीय मानकों का पालन करना चाहिए।
जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है फिल्म
निर्देशक हनी त्रेहन के निर्देशन में बनी यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। खालड़ा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित तौर पर बिना पहचान के किए गए हजारों अंतिम संस्कारों का मामला उठाया था, जिसने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया।
वर्ष 1995 में उनका कथित अपहरण कर लिया गया था, जिसके बाद वे लापता हो गए। इस मामले की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद 2005 में पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को दोषी ठहराया गया। बाद में 2007 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दिया।
चूंकि फिल्म इसी संवेदनशील ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है, इसलिए यह कई वर्षों से नियामकीय जांच के दायरे में रही है।
OTT प्लेटफॉर्म के लिए क्या हैं कानूनी प्रावधान?
भारत में सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली फिल्मों के विपरीत ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित सामग्री के लिए CBFC प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि डिजिटल प्लेटफॉर्म सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत संचालित होते हैं।
इन नियमों के अनुसार किसी भी डिजिटल कंटेंट को प्रकाशित करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वह भारत की संप्रभुता, अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी देशों के साथ संबंधों को प्रभावित न करे।
हालांकि इन नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर न्यायालयों में कानूनी चुनौती भी लंबित है। वर्ष 2021 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने डिजिटल मीडिया आचार संहिता के कुछ हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाई थी। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम राहत पूरे देश में लागू होगी।
इसके अतिरिक्त नियम 16 के तहत सरकार को आपातकालीन परिस्थितियों में तत्काल कार्रवाई करने का अधिकार भी प्राप्त है। यदि किसी सामग्री को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के दायरे में पाया जाता है, तो मंत्रालय कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे हटाने या ब्लॉक करने के निर्देश जारी कर सकता है।
अब आगे क्या होगा?
अब सभी की निगाहें इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं। समिति फिल्म की सामग्री का विस्तृत अध्ययन करने के बाद अपनी सिफारिशें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंपेगी। इसके आधार पर यह तय होगा कि फिल्म मौजूदा स्वरूप में दोबारा ओटीटी पर उपलब्ध होगी, उसमें संशोधन करना होगा या उस पर अन्य नियामकीय प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
यह मामला केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में तेजी से बढ़ते ओटीटी उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में लिया गया निर्णय भविष्य में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने वाली संवेदनशील फिल्मों और वेब सीरीज के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
फिल्म निर्माता, ओटीटी प्लेटफॉर्म, कानूनी विशेषज्ञ और दर्शक सभी इस फैसले का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होगा कि डिजिटल युग में रचनात्मक अभिव्यक्ति, ऐतिहासिक विषयों की प्रस्तुति और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाएगा।

