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क्या बदल रहा है टेस्ट क्रिकेट का असली रंग?

क्या बदल रहा है टेस्ट क्रिकेट का असली रंग?

Crictoday 2 weeks ago

दिल्ली: ऐसा नहीं कि ये कोई नया मुद्दा है पर हाल में जल्दी खत्म हो रहे टेस्ट की गिनती एकदम बढ़ी है। इंग्लैंड के पूर्व खिलाड़ी माइकल आथर्टन ने टेस्ट फॉर्मेट के मैच जल्दी खत्म होने पर वजह के तौर पर जो लिखा, उससे ये मुद्दा और भी गरमा गया।

बात गलत नहीं क्योंकि पिछले दिनों के इंग्लैंड-पाकिस्तान लीड्स टेस्ट और ऑस्ट्रेलिया-बांग्लादेश मैके टेस्ट 3 दिन से ज्यादा नहीं चल पाए। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में तीन दिन या उससे कम में खत्म होने वाले टेस्ट की जो गिनती 7 प्रतिशत थी, अब 20 प्रतिशत तक जा पहुंची है। 1946 और 2000 के बीच एक भी टेस्ट दो दिन में खत्म नहीं हुआ पर पिछले दशक में 9 टेस्ट दो दिन में खत्म हो गए।

आथर्टन ने जो लिखा वह तो ख़ास है ही पर कुछ और फैक्ट भी ध्यान देने वाले हैं:

1) टेस्ट क्रिकेट में अच्छे बल्लेबाज कम हो रहे हैं क्योंकि टी20 क्रिकेट की वजह से बल्लेबाज डिफेंस के बजाय शॉट्स खेलने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। अब कितने बल्लेबाज 200 और 300 के स्कोर बना रहे हैं?

2) खिलाड़ी फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलते ही नहीं। इसके लिए वे अकेले दोषी नहीं क्योंकि क्रिकेट कैलेंडर ही ऐसा होता जा रहा है। नए क्रिकेटर अब शुरू से ऐसा खेलना चाह रहे हैं, जो टी20 क्रिकेट के लिए सही हो ताकि फ्रेंचाइजी क्रिकेट में ज्यादा कामयाब रहें। नतीजा: क्रीज पर टिके रहने की आर्ट तो गायब हो रही है।

3) सीरीज शेड्यूल बदलने और टी20 लीग बढ़ने से, टेस्ट सीरीज से पहले होने वाले वार्म-अप मैच कम या गायब जैसे ही हो रहे हैं। नतीजा ढेरों बल्लेबाज रेड-बॉल क्रिकेट के हालिया अनुभव के बिना ही टेस्ट मैच खेल रहे हैं।

4) डिसीजन रिव्यू सिस्टम ने गेंदबाजों को जो मदद दी, उससे एलबीडब्ल्यू में अब बल्लेबाजों को नहीं, उन्हें फायदा मिल रहा है।

5) पिचें अब ऐसी हैं जिन पर नतीजा मिले क्योंकि अब ड्रॉ को बोरिंग और क्रिकेट के लिए सही नहीं मान रहे (बशर्ते जबरदस्त मुकाबला न देखने को मिले)। अब पिच बैटिंग-फ्रेंडली हो तो आलोचना होती है जबकि पिछली सदी में ऐसी पिचें आम बात थीं।

6) ऑफ सीजन या मैचों को उन दिनों में खेलने से जब पहले नहीं खेलते थे, टेस्ट मैचों में ओवर कम हो रहे हैं। बारिश, खराब रोशनी और धीमे ओवर-रेट की वजह से असल में कितना क्रिकेट खेला गया?

अगर ऐसा ही है और इसे महसूस भी किया जा रहा है तो 5 दिन वाला टेस्ट खेलें ही क्यों? पिछले महीने की ऑस्ट्रेलिया- बांग्लादेश दो-टेस्ट की सीरीज सिर्फ 425.3 ओवर चली (डार्विन में 300.3 और मैके में 125 ओवर) यानि कि दो टेस्ट में, एक 5 दिन वाले टेस्ट के 450 ओवर भी न खेले। उसके बाद हेडिंग्ले में पाकिस्तान के विरुद्ध टेस्ट तीसरे दिन ही खत्म हो गया (175.3 ओवर) जबकि लॉर्ड्स टेस्ट को बरसात ने ही चौथे दिन तक खींचा।

इस सब को देखकर ही ये चर्चा सही है कि अगर टेस्ट जल्दी खत्म हो रहे हैं, तो टेस्ट के 5 दिन के शेड्यूल की जरूरत ही क्या है? मौजूदा दशक में हर 5 में से लगभग 3 टेस्ट मैच में पांचवें दिन नहीं खेले। ये सब कुछ टीम के खराब प्रदर्शन या ग्रीन टॉप पिच का नतीजा नहीं है, आधुनिक दौर में टेस्ट क्रिकेट खेलने के तरीके में बड़े बदलाव का संकेत है।

टेस्ट शेड्यूल ही 4 दिन का हो तो खर्चा बचेगा और सीरीज को भी सही शेड्यूल के साथ खेल सकेंगे। इसलिए ही आईसीसी ने 4 दिन के टेस्ट शेड्यूल किए जिसमें हर दिन 98 ओवर और कुल 392 ओवर। आज के दौर में औसतन टेस्ट मैच में ओवर की गिनती तो इससे भी लगभग 120 ओवर कम है तो ज्यादातर टेस्ट के लिए 5 दिन की जरूरत ही नहीं पड़ती। आईसीसी ने टीमों का हालिया रिकॉर्ड देखकर कुछ टीम के टेस्ट ही 4 दिन वाले शेड्यूल किए और इस सोच पर मोहर लगाई कि इससे यह तय नहीं होता कि टेस्ट में 5 दिन के खेल की जरूरत ही नहीं है।

यहां एक बड़ी मजेदार बात ये सामने आई कि 2000 और 2020 की शुरुआत के बीच जिन 704 टेस्ट में स्पष्ट फैसला मिला उनमें से 293 टेस्ट पांचवें दिन तक चले पर मजेदार बात ये है कि उनमें से 187 मैच में वास्तव में 392 या उससे कम ओवर खेले। इसका मतलब तो ये हुआ कि खेल के हिसाब से तो वे भी '4 दिन के टेस्ट' ही थे। इसी बात का दूसरा पहलू ये है कि हर टेस्ट में हर दिन 90 ओवर तो खेलते नहीं तो क्या खेल जल्दी शुरू कर 98 ओवर फेंक लेंगे?

ढेरों ऐसे टेस्ट हैं जो भले ही ड्रा रहे पर स्पष्ट नतीजे वाले टेस्ट से भी ज्यादा रोमांचक और 5 दिन चले। इनकी या 5 दिन वाले टेस्ट की गिनती भले ही कम हो रही है पर 5 दिन वाले टेस्ट को बंद नहीं कर सकते। हां, टीम को देख, आईसीसी उसी 4 दिन वाले टेस्ट के प्रयोग को और बढ़ा सकती है।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Crictoday