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Election Results 2026: मुस्लिम 'महारथियों' का सूपड़ा साफ; ओवैसी, अजमल और पीरजादा का जादू फेल, जानिए कहाँ और कैसे बिगड़ा खेल

Election Results 2026: मुस्लिम 'महारथियों' का सूपड़ा साफ; ओवैसी, अजमल और पीरजादा का जादू फेल, जानिए कहाँ और कैसे बिगड़ा खेल

ई दिल्ली/कोलकाता: 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के रुझानों ने एक बड़ी हकीकत बयां की है-इस बार भारतीय राजनीति में 'मुस्लिम कार्ड' पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। पश्चिम बंगाल से लेकर असम तक, मुस्लिम वोटबैंक पर पकड़ रखने वाले दिग्गजों को जनता ने सिरे से नकार दिया है।

रुझानों के मुताबिक, जहाँ बंगाल में बीजेपी ऐतिहासिक जीत की ओर है, वहीं असम में बदरुद्दीन अजमल का ‘किंगमेकर’ वाला रसूख मिट्टी में मिल गया है।

पश्चिम बंगाल: हुमायूं कबीर और पीरजादा नौशाद को मिली शिकस्त

बंगाल में इस बार मुस्लिम राजनीति के दो बड़े चेहरों-हुमायूं कबीर और पीरजादा नौशाद सिद्दीकी-को करारी हार का सामना करना पड़ रहा है।

  • हुमायूं कबीर (AJUP): मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर सुर्खियां बटोरने वाले कबीर की पार्टी 115 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन एक भी सीट पर बढ़त नहीं बना सकी। कबीर खुद अपनी दोनों सीटों (रेजीनगर और नोआदा) पर पीछे चल रहे हैं।

  • पीरजादा नौशाद सिद्दीकी (ISF): फुरफुरा शरीफ के प्रभाव वाले नौशाद सिद्दीकी अपनी पारंपरिक सीट भांगड़ से पीछे हैं। यहाँ टीएमसी के शौकत मोल्ला ने बड़ी बढ़त बना ली है। लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद आईएसएफ मुस्लिम बहुल जिलों (मालदा, हुगली, हावड़ा) में कोई कमाल नहीं कर पाई।

असम: बदरुद्दीन अजमल का ‘ताला-चाबी’ हुआ फेल

असम की राजनीति में कभी ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाले बदरुद्दीन अजमल (AIUDF) इस बार हाशिए पर आ गए हैं।

  • कांग्रेस से गठबंधन टूटने का नुकसान अजमल को साफ दिख रहा है। एआईयूडीएफ 27 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन सिर्फ 2 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है।

  • अजमल खुद बिन्नाकांडी सीट से आगे जरूर हैं, लेकिन उनकी पार्टी को 14 सीटों का भारी नुकसान हो रहा है। कांग्रेस ने मुस्लिम वोट तो बटोरे, लेकिन हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण ने बीजेपी की राह आसान कर दी।

ओवैसी का ‘बिहार मॉडल’ बंगाल-असम में बेअसर

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को इस बार बंगाल और असम दोनों जगह निराशा हाथ लगी है।

  • बंगाल की 8 सीटों पर ओवैसी ने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन वे कहीं भी मुख्य मुकाबले में नजर नहीं आए।

  • असम में ओवैसी ने खुद 8 रैलियां कर बदरुद्दीन अजमल के लिए वोट मांगे थे, लेकिन जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखा। मुस्लिम मतदाताओं ने ओवैसी और अजमल के बजाय कांग्रेस और टीएमसी जैसे बड़े विकल्पों को चुनना बेहतर समझा।

निष्कर्ष: ध्रुवीकरण और ‘नॉन-मुस्लिम’ कंसोलिडेशन

इन चुनावी नतीजों से साफ है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी मतदाताओं ने छोटी और धार्मिक पहचान वाली पार्टियों के बजाय बड़ी पार्टियों पर भरोसा किया। वहीं दूसरी ओर, बीजेपी ने असम और बंगाल में हिंदू मतों का जबरदस्त ध्रुवीकरण कर इन ‘महारथियों’ के प्रभाव को खत्म कर दिया।

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