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आरटीई की राह में निजी स्कूलों की मनमानी, 5 महीने बाद भी सैकड़ों बच्चों को नहीं मिला प्रवेश

आरटीई की राह में निजी स्कूलों की मनमानी, 5 महीने बाद भी सैकड़ों बच्चों को नहीं मिला प्रवेश

कोटा। सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए आरटीई (शिक्षा का अधिकार) कानून बनाया, लेकिन शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के गृह जिले में हीतई स्कूल कानून की जमकर धज्जियां उड़ा रहे है।

आरटीई लॉटरी में चयनित होने के 5 महीने बाद भी जिले में सैंकड़ों बच्चों को स्कूलों में प्रवेश नहीं मिला। कोई फीस मांग रहा तो कोई नॉन आरटीई के एडमिशन नहीं होने का बहाना बनाकर अभिभावकों को टरका रहे हैं। वहीं, जिम्मेदार शिक्षा अफसर भी निजी स्कूलों की मनमानी के आगे लाचार नजर आ रहे हैं। हालात यह हैं, विभाग के माध्यमिक व प्रारंभिक कार्यालय में शिकायतों का ढेर लगा हुआ है। राहत दिलाने की बजाए अफसर स्कूलों को पत्र भेज जवाब मांग रहे हैं लेकिन स्कूल संचालकों द्वारा अधिकतर शिकायतों का जवाब तक नहीं दे रहे। मजबूरन अभिभावकों ने जिला कलक्टर व राजस्थान सरकार के सम्पर्क पोर्टल 181 पर भी शिकायत कर चुके, लेकिन अब तक कोई राहत नहीं मिली। नतीजन, नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए पांच महीने बीत गए लेकिन घर बैठे सैकड़ों बच्चे हर रोज अभिभावकों से सिर्फ एक सवाल पूछ रहे हैं-पापा, मैं कब स्कूल जाऊंगा?

7 दिन बाद भी निदेशालय ने नहीं दिया मार्गदर्शन
शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, लगातार मिल रही शिकायतों के बाद शिक्षा विभाग ने कुछ निजी स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किए, लेकिन स्कूलों ने इनका जवाब तक नहीं दिया। इसके बाद विभाग ने शिक्षा निदेशालय, बीकानेर से मार्गदर्शन मांगा, लेकिन सात दिन बाद भी कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिलने से कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।

मासूमों का सवाल, मैं कब स्कूल जाऊंगा?
आरटीई में चयनित होने के बाद भी महीनों से घर बैठे मासूम बच्चों का यही सवाल अब शिक्षा अफसरों की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया। सरकार की योजना का लाभ पाने के बजाय यह बच्चे विभागीय लापरवाही और निजी स्कूलों की मनमानी के बीच अपना पूरा शैक्षणिक सत्र गंवाने की कगार पर हैं। उनका एक ही सवाल हैं, आखिर, मैं कब स्कूल जाऊंगा?

अभिभावक बोले-सुविधा की जगह दुविधा बना कानून
कंसुआ निवासी अब्दुल गफ्फार का आरोप है, वर्ष 2023 में बच्चे का आरटीई केतहत कंसुआ स्थित निजी स्कूल में एचकेजी में एडमिशन हुआ था। बच्चा आज तीसरी क्लास में पहुंच गया। लेकिन, मार्च 2026 से स्कूल संचालक तीन वर्ष पूर्व एचकेजी की फीस मांग रहा है। आरटीई का हवाला देने पर बच्चे को स्कूल में एंट्री देने से रोक दिया। वहीं, गत वर्ष कक्षा-2 की परीक्षा में दो पेपर के बाद आगे के पेपर देने के लिए परीक्षा में भी बैठने नहीं दिया।

बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह ने बताया कि दोस्त धर्मेंद्र गोस्वामी के बेटे अर्नव का आरटीई लॉटरी में पहला नंबर है। डॉक्यूमेंट वेरिफाई होे गए और पोर्टल पर चयनित लिखा हुआ भी आ गया है। इसके बावजूद स्कूल संचालक द्वारा जयपुर द्वारा हमें पीपी-4 की सीटें अलॉट नहीं होने का हवाला देते हुए एडमिशन देने से मना कर दिया। अब हम क्या करें, 4 माह से बच्चा घर बैठा है।

मानपुरा निवासी नसरुद्दीन का कहना है, पोर्टल पर प्रवेशित होने के बावजूद एडमिशन नहीं मिला। दस्तावेज जमा करवाने गए तो स्कूल संचालक ने प्री-प्राइमरी कक्षा संचालित नहीं होने की बात कहते हुए एडमिशन देने से इंकार कर दिया। जबकि, फॉर्म भरते समय स्कूल की प्रोफाइल में प्री-प्राइमरी कक्षा का विवरण होने पर ही हमने नर्सरी के लिए आवेदन किया था।

इस तरह की शिकायतें मिल रहीं हैं। संबंधित स्कूलों को पत्र भेज जवाब मांग रहे हैं। फीस मांगने, नॉन आरटीई के एडमिशन नहीं होने सहित अन्य शिकायतों की वास्तविकता भी परखी जा रही है। वहीं, इस संबंध में शिक्षा निदेशालय बीकानेर को पत्र भेज मार्गदर्शन मांगा है, वहां से जो निर्देश प्राप्त होंगे, उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
-रामचरण मीणा, जिला शिक्षाधिकारी माध्यमिक कोटा

आरटीई उप निदेशक ने नहीं दिया जवाब
नवज्योति ने इस संबंध में शिक्षा निदेशालय बीकानेर में राजस्थान की आरटीई उपनिदेशक चंद्रकिरण को फोन कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन फोन अटैंड नहीं किया।

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