पाकिस्तान में एक 13 वर्षीय ईसाई लड़की के कथित अपहरण, जबरन धर्मांतरण और बाल विवाह से जुड़े मामले में अदालत के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, फैसलाबाद की एक अदालत ने नाबालिग लड़की की हिरासत उसी व्यक्ति को सौंप दी, जिस पर उसके अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप है।
मानवाधिकार संगठन ‘वॉयस फॉर जस्टिस’ के अध्यक्ष जोसेफ जानसेन ने दावा किया कि अदालत ने यह फैसला उस समय सुनाया, जब लड़की की वास्तविक उम्र तय करने के लिए अदालत द्वारा आदेशित मेडिकल जांच अभी बाकी थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, 13 वर्षीय अंबर नदीम ने अदालत में दिए एक हलफनामे में कहा कि उसने अपनी इच्छा से इस्लाम कबूल किया और मोहसिन लियाकत से शादी की है। साथ ही उसने यह भी कहा कि उसका अपहरण नहीं हुआ था। इसी बयान के आधार पर अदालत ने आरोपी मोहसिन लियाकत को जमानत दे दी। इसके बाद लड़की आरोपी के परिजनों और वकीलों के साथ अदालत से चली गई, जबकि उसके माता-पिता अदालत परिसर में मौजूद रहे। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक दिन पहले न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने लड़की ने कथित तौर पर कहा था कि आरोपी पक्ष ने उसे बालिग होने का झूठा बयान देने के लिए दबाव डाला था। इसके बाद आरोपी की ओर से धर्मांतरण और विवाह प्रमाणपत्र पेश किया गया, जिसमें लड़की की जन्मतिथि जून 2008 दर्ज थी। हालांकि, लड़की के माता-पिता के अनुसार उनकी शादी वर्ष 2012 में हुई थी। इस विरोधाभास को देखते हुए मजिस्ट्रेट ने लड़की की उम्र निर्धारित करने के लिए मेडिकल जांच के आदेश दिए थे और उसे सरकारी शेल्टर होम भेजने का निर्देश दिया था
