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आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का उत्सव

ह उत्सव केरल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न धर्मों और परंपराओं का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

केरल की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ इसके मंदिरों और पारंपरिक उत्सवों तक सीमित नहीं है।

यहां के ईसाई समुदाय के पर्व भी उतने ही भव्य और जीवंत हैं तथा लोकजीवन से जुड़े हुए हैं। इन्हीं में से एक एडथुआ पेरुनल उत्सव है, जो मुख्यतः सेंट जॉर्ज को समर्पित है और इसे केवल केरल के महत्वपूर्ण ईसाई धार्मिक आयोजनों में ही नहीं गिना जाता, बल्कि यह दूसरे दक्षिणी राज्यों के ईसाई समुदायों के साथ-साथ दुनियाभर के सांस्कृतिक पर्यटकों के लिए भी महत्वपूर्ण आयोजन है।
धार्मिक और सांस्कृतिक समागम
एडथुआ पेरुनल उत्सव हर साल अप्रैल के अंत से मई की शुरुआत तक लगभग 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस साल यह 27 अप्रैल से 7 मई तक मनाया जाएगा। इस दौरान चर्च परिसर और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र में एक विशाल मेले का आयोजन होता है। हजारों श्रद्धालु न केवल आस्था और श्रद्धा से इस उत्सव में भाग लेते हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक पर्यटक भी इसका हिस्सा बनने के लिए देश और विदेश की अनेक जगहों से आते हैं। उत्सव की शुरुआत विशेष प्रार्थनाओं और ध्वजारोहण से होती है। इसके बाद हर दिन अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान, जुलूस और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अंतिम दिन का जुलूस या प्रोसेशन सबसे भव्य होता है, जिसमें सेंट जॉर्ज की प्रतिमा को सुसज्जित रथ पर निकालकर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इस उत्सव की विशेषता यह है कि यह धार्मिक कम, सांस्कृतिक उत्सव ज्यादा है, इसलिए यह केरल की सार्वभौमिक सह-अस्तित्व की भावना को दर्शाता है।
पारंपरिक रंग
इसमें दूसरे कई उत्सवों की तरह सजे-धजे हाथियों के साथ जुलूस निकाला जाता है, जो कि केरल के विशिष्ट उत्सवों की सबसे खास पहचान है। लोग पारंपरिक संगीत और लोकनृत्य का लुत्फ उठाते हैं। स्थानीय बैंड, चर्च संगीत और लोकनृत्य इस उत्सव को न केवल केरल के विशिष्ट उत्सवों में जगह दिलाते हैं, बल्कि इसे खास महत्व भी देते हैं। इस उत्सव के दौरान रात के समय भव्य आतिशबाजी के नजारे भी देखने को मिलते हैं, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। एडथुआ पेरुनल का धार्मिक महत्व भी खूब है, क्योंकि सेंट जॉर्ज को एक चमत्कारी संत माना जाता है। श्रद्धालुओं के मुताबिक इस उत्सव में भाग लेने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, विशेषकर बीमारियों और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस उत्सव में हिस्सा लेने आए लोग अपनी तरह-तरह की मन्नतें मांगते हैं और उनके पूरे होने पर सेंट जॉर्ज को धन्यवाद देने के लिए पुनः-पुनः इस उत्सव में शामिल होने का संकल्प लेते हैं। इसलिए यह पारंपरिक आयोजन व्यक्तिगत आस्था और सामूहिक विश्वास का भी संगम बन जाता है।
विविधता में एकता
एडथुआ पेरुनल उत्सव की एक अनोखी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। यह उत्सव धार्मिक सीमाओं से परे जाकर लोगों को आपस में जोड़ता है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग मिलकर उत्सव मनाते हैं। ऐसे में यह एकता में विविधता का जीवंत उदाहरण बन जाता है। यह उत्सव इस बात को भी दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति केवल विविधता से भरपूर ही नहीं है, बल्कि इसमें गहरा साझा भाव भी है। केरल जैसे राज्य में, जहां साक्षरता और सामाजिक जागरूकता उच्च स्तर पर है, ऐसे आयोजन समाज को और अधिक मजबूत बनाते हैं।
आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव
इस उत्सव का स्थानीय अर्थव्यवस्था के साथ भी एक बेहद गहरा और सकारात्मक रिश्ता है। इस तरह यह उत्सव केवल सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आज के समय में, जब समाज में विभाजन और तनाव की खबरें अक्सर आती रहती हैं, एडथुआ पेरुनल जैसे उत्सव हमें सकारात्मक संदेश देते हैं। यह उत्सव सिखाता है कि धर्म और संस्कृति लोगों को जोड़ने का माध्यम हो सकते हैं, न कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करने का।
एकता का जीवंत प्रतीक
इसके साथ ही यह परंपराओं को आधुनिक बनाने का भी उदाहरण है। जहां एक तरफ प्राचीन अनुष्ठान होते हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक व्यवस्थाएं भी आयोजन का हिस्सा होती हैं। कुल मिलाकर एडथुआ पेरुनल जैसे उत्सव सिर्फ धार्मिक भाव के पर्व नहीं हैं, बल्कि यह आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यह उत्सव केरल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न धर्मों और परंपराओं का सुंदर संगम देखने को मिलता है। इस प्रकार एडथुआ पेरुनल जैसा उत्सव, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, भारतीय संस्कृति की उस व्यापक सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है, जो विविधता में एकता को सबसे बड़ा मूल्य मानती है। इ.रि.सें

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