E20 Green Fuels : गांव पन्नीवाला रुलदु में स्थित करीब दो सौ करोड़ रूपये लागत वाले ई-20 ग्रीन फ्यूल्स प्राइवेट लिमिटेड में कृषि उपयोग की यूरिया के कथित औद्योगिक इस्तेमाल का मामला सामने आया है।
यह फैक्ट्री भारत सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों को एथेनॉल सप्लाई करती है। कृषि विभाग की जांच के बाद सदर थाना पुलिस ने ई-20 फैक्ट्री और दिल्ली की सप्लायर फर्म शुभम इंटरनेशनल (बुराड़ी) के खिलाफ धोखाधड़ी, आवश्यक वस्तु अधिनियम और फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर के तहत मुकदमा दर्ज किया है। विभाग ने संदिग्ध खाद के 10 सैंपल भी लिए हैं।
जांच टीम ने फैक्ट्री के स्टोर रूम से यूरिया के कुल 763 थैले बरामद किए। इनमें 'एग्रीकल्चर ग्रेड' वाले इंडियन पोटाश लिमिटेड के 6 पीले थैले (45 किलोग्राम) बरामद हुए। बाकी 757 थैले (50 किलोग्राम) भी संदेह के घेरे में हैं, जिन पर बैच नंबर, निर्माण तिथि और निर्माता कंपनी जैसी जरूरी जानकारी गायब थी।
आरोप है कि फैक्ट्री में कमर्शियल काम के लिए किसानों को मिलने वाली सस्ती सब्सिडी वाली कृषि यूरिया का इस्तेमाल किया जा रहा था। 757 थैले बिना पहचान के मिलने से खरीद और सप्लाई के कागजात सवालों के घेरे में आ गए हैं। एफआईआर के मुताबिक, फैक्ट्री के खरीद ऑर्डर में माल का नाम छिपाने के लिए 'ऑर्गेनिक कम्पोस्ट' लिखा गया था, जबकि सप्लायर के बिलों में उसी माल को 'टेक्निकल ग्रेड यूरिया' दिखाया गया था। इससे पूरे खरीद रिकॉर्ड पर बड़ा संदेह पैदा हो गया है।
यह मामला भारतीय किसान एकता (बीकेई) के प्रदेशाध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख की शिकायत के बाद सामने आया। सिरसा के उपनिदेशक कृषि विभाग द्वारा गठित कमेटी में उपमंडल कृषि अधिकारी अमित शर्मा, सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी विजेंद्र पाल और गुण नियंत्रण निरीक्षक अमित कुमार व किसान नेता भी शामिल थे।
जांच के दौरान अधिकारियों को थैलों से नीम की महक आई। सरकार खेती वाली यूरिया की पहचान के लिए उसमें नीम तेल की कोटिंग कराती है, इससे अधिकारियों का शक गहरा हो गया कि बाकी थैलों में भी कृषि यूरिया ही है। नियमों के अनुसार फैक्ट्रियों में सिर्फ टेक्निकल ग्रेड यूरिया का इस्तेमाल हो सकता है।
कृषि अधिकारीयों के मुताबिक छापेमारी के दौरान फैक्ट्री प्रबंधन ने कंपनी नीति का हवाला देते हुए कहा कि बाहरी मजदूरों को अंदर आने की अनुमति नहीं है और मजदूरों का बीमा होना जरूरी है। अधिकारियों ने सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस की मौजूदगी में सरकारी स्तर पर मजदूर लगवाकर सारा माल बाहर निकलवाया और सीज कर दिया। थाना सदर प्रभारी अनिल कुमार ने बताया कि मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
दूसरी ओर, ई-20 ग्रीन फ्यूल्स के सीईओ हैरी ग्रोवर ने कहा कि वह इस समय विदेश में हैं, यह एक बड़ा प्रोजेक्ट है और फैक्ट्री की सारा कार्य पारदर्शिता से किया जाता है। इतने छोटे स्तर पर खाद वगैरा के जरिये बचत करने की कोई वजह ही नहीं है।
7.5 गुना मुनाफे का खेल: दामों में बड़ा अंतर
कृषि विभाग की जांच में सामने आया कि फैक्ट्री में इथेनॉल उत्पादन के दौरान मशीनों को ठंडा रखने के लिए रोज करीब 10 से 12 बैग (500 से 600 किलो) यूरिया की जरूरत पड़ती है। किसानों को मिलने वाली सब्सिडी वाली कृषि यूरिया का एक थैला करीब 266.50 रुपये में मिलता है, जबकि फैक्ट्रियों में इस्तेमाल टेक्निकल ग्रेड यूरिया के एक थैले की कीमत करीब 2 हजार रुपये बताई जाती है। दोनों के दामों में करीब 7.5 गुना का अंतर होने के कारण ही यह अवैध खेल चल रहा था।
केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग
बीकेई के प्रदेशाध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख ने कहा कि सब्सिडी वाली यूरिया का औद्योगिक उपयोग होने से किसानों को खाद मिलने में दिक्कत हो रही है और सरकारी पैसे का दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने मांग की कि कई राज्यों में फैले इस यूरिया खाद घोटाले की जांच किसी केंद्रीय जांच एजेंसी से करवाई जाए।
