दैनिक ट्रिब्यून वेब एक्सप्लेनर : देश में इस साल मानसून की असमान चाल ने किसानों और सरकार दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ‘एल नीनो’ (El Nino) के संभावित खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार पूरी तरह से सतर्क हो गई है।
शुक्रवार को नई दिल्ली के कृषि भवन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरीफ फसलों की बुवाई, मानसून की स्थिति, उर्वरक उपलब्धता और खाद्यान्न भंडारण पर एक विस्तृत समीक्षा बैठक की। सरकार का मुख्य फोकस देश के उन 262 जिलों पर है, जहां अब तक बारिश की कमी दर्ज की गई है।
इस दैनिक ट्रिब्यून वेब एक्सप्लेनर में हम समझेंगे कि सरकार की इस बैठक के क्या मायने हैं, एल नीनो खेती का गणित कैसे बिगाड़ सकता है और मानसून के धोखा देने पर किसानों को बचाने वाली सरकार की आकस्मिक योजना (कॉन्टिंजेंसी प्लान) आखिर है क्या?
मानसून ने क्यों बढ़ाई सरकार की धड़कनें? रडार पर 262 जिले
बैठक में मौसम और बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया गया कि देशभर में ऐसे 262 जिलों की पहचान की गई है, जो बारिश की कमी के कारण संवेदनशील श्रेणी में हैं।
राहत की बूंदें: इनमें से 52 जिलों में पिछले कुछ दिनों में बारिश दर्ज की गई है, जिससे इन क्षेत्रों में बुवाई को गति मिलेगी।
सूखे का डर: 210 जिले अभी भी वर्षा की कमी का सामना कर रहे हैं। इनमें से 8 जिलों में तो अब तक नगण्य (न के बराबर) या बिल्कुल बारिश नहीं हुई है।
मौसम विभाग के अनुसार, 2 जुलाई से सक्रिय हुए पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से आगामी दो-तीन दिनों में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में मानसून के आगे बढ़ने की संभावना है। हालांकि, समग्र रूप से इस वर्ष सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया गया है। महाराष्ट्र में हालिया बारिश के बावजूद जलाशयों का घटता जलस्तर और उत्तरी गुजरात में बारिश की कमी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
खौफ का दूसरा नाम ‘एल नीनो’: कैसे यह बिगाड़ सकता है खरीफ का गणित?
प्रशांत महासागर के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की भौगोलिक घटना को ‘एल नीनो’ कहा जाता है। इसका सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ता है, जिससे कई बार बारिश सामान्य से कम होती है या सूखे की स्थिति बन जाती है। वर्तमान में खरीफ का सीजन चल रहा है, जिसमें मुख्य रूप से धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, मूंग, उड़द और अरहर जैसी फसलें बोई जाती हैं। ये फसलें काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर होती हैं। बारिश में लंबी देरी से इन फसलों की बुवाई पिछड़ सकती है, जिससे न सिर्फ उत्पादन गिरेगा बल्कि बाजार में महंगाई भी बढ़ सकती है।
क्या है सरकार का ‘कॉन्टिंजेंसी प्लान’, जो बनेगा किसानों का सुरक्षा कवच?
समीक्षा बैठक में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस ‘कॉन्टिंजेंसी प्लान’ (आकस्मिक योजना) को लागू करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह दरअसल मानसून के फेल होने की स्थिति का ‘प्लान-B’ है। इसके तहत मुख्य रूप से ये कदम उठाए जाते हैं:
वैकल्पिक फसलें: किसानों को कम पानी और कम समय में पककर तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों के बीज उपलब्ध कराना।
पैटर्न में बदलाव: पानी की अधिक खपत वाले धान की जगह मक्का या दलहन जैसी कम पानी मांगने वाली फसलों की बुवाई की सलाह देना।
नमी संरक्षण: खेतों में नमी बनाए रखने की नई कृषि तकनीकों को बढ़ावा देना।
संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए 15 राज्यों ने नोडल अधिकारियों की नियुक्ति कर दी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (CRIDA) ने भी जिला स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) को भी अपने-अपने जिलों में आपातकालीन उपायों के साथ मुस्तैद रहने को कहा गया है। जल्द ही अधिक प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर ग्राउंड जीरो की हकीकत परखी जाएगी।
बीज, खाद और घटता जलस्तर: अगर बारिश नहीं हुई तो क्या हैं इंतजाम?
सरकार के लिए फिलहाल एक बड़ी चिंता पानी की उपलब्धता है। देश के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण पिछले साल के मुकाबले कम है, हालांकि गनीमत यह है कि अधिकांश इलाकों में भूजल (Groundwater) की स्थिति अभी स्थिर बनी हुई है।
किसानों के लिए राहत की बात यह চরম राष्ट्रीय बीज निगम के पास बुवाई के लिए पर्याप्त बीज भंडार मौजूद है। उर्वरकों की स्थिति भी मांग से बेहतर है। अप्रैल से जून 2026 के बीच 176.13 लाख मीट्रिक टन (LMT) उर्वरक की आवश्यकता थी, जबकि इसके मुकाबले 286.37 LMT उर्वरक उपलब्ध कराया गया। कृषि मंत्री ने जनजातीय क्षेत्रों में खाद की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया है।
किसानों को आर्थिक झटके से बचाने के लिए सरकार ने प्रभावित जिलों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का कवरेज बढ़ाने और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के जरिये ऋण वितरण में तेजी लाने के भी सख्त निर्देश दिए हैं, ताकि खराब मौसम का सीधा असर किसान की जेब पर न पड़े।
