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गर्भ से ब्रह्मज्ञान तक

युर्वेद की कक्षा में एक छात्र ने अपने गुरु से प्रश्न किया कि गुरुदेव, मनुष्य को न तो अपने जन्म का पता चलता है और न ही अपनी मृत्यु का। फिर जीवन और मृत्यु का वास्तविक रहस्य क्या है?

गुरु बोले, जैसे तृण-जलायुका (जोंक) घास के एक तिनके के अंतिम सिरे तक पहुंचकर पहले दूसरे तिनके को दृढ़ता से पकड़ती है और उसके बाद ही पहले तिनके को छोड़ती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी अपने संचित कर्मों और वासनाओं के अनुसार अगले शरीर का आधार प्राप्त करती है। और वह पुराने शरीर से अपना संबंध समाप्त कर देती है। गुरु ने आगे समझाया कि नया शरीर प्राप्त करने की प्रक्रिया माता के गर्भ के माध्यम से होती है। गर्भ ही वह सेतु है जिसके द्वारा जीवात्मा एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा पूर्ण करती है।

गर्भ तम से ढक जाता है जिसके कारण उसके पहले जन्म की बातों का स्मृति नाश हो जाता है। इसलिए उसे पूर्वजन्म की बातें याद नहीं रहती। अगला शरीर उसको संचित कर्मों और वासनाओं के अनुसार अगला जन्म मिलता है। इसी कारण जीव बार-बार जन्म और मृत्यु के इस चक्र में जोंक की भांति एक शरीर से दूसरे शरीर में भ्रमण करता रहता है। यह यात्रा तब तक चलती रहती है जब तक उसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता। ज्ञान होने पर कर्मबंधन समाप्त हो जाते हैं और जन्म-मृत्यु का यह अनवरत चक्र भी रुक जाता है।

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