किंवदंतियों व कई ग्रंथों में भोजन और उत्तेजकता के संबंधों का वर्णन मिलता है। भारत समेत दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं में शहद, बादाम, अंगूर, मशरूम, चॉकलेट, नारियल, चने, सी फूड, जिनसेंग और अन्य खाद्य पदार्थों को कामोत्तेजक व शुक्रवर्द्धक माना जाता रहा।
दरअसल, हर युग में समाज का सक्षम वर्ग ऐसे आहार की तलाश में रहा। इब्न बतूता के यात्रा-वृत्तांत, 'कॉन्स्टेंटाइन' की रचनाओं और सुल्तान ग़ियात शाह के 'निमतनामा' में ऐसे भोजन और नुस्खों का उल्लेख है। इसमें वेज व नॉन वेज दोनों शामिल है। हालांकि इन दावों के कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं मिलते हैं, बेशक ये प्रचलन में भी हों।
भोजन और उसकी तासीर का संबंध मौलिक है, लेकिन कुछ खाद्य पदार्थ दूसरों की तुलना में अधिक कामोत्तेजक गुण वाले होते हैं। प्राचीन मिस्रवासी, और होमर की जादूगरनियां सभी मंड्रेक पौधे की जड़ और फल की पूजा करती थीं। अंगूर, ग्रीक डायोनिसियन पंथों के कामुक अनुष्ठानों में प्रमुख स्थान रखता था। प्रशिक्षित गीशाएं (नर्तकी व गायिका) अपने ग्राहकों के लिए रसीले अंगूर छीलने के लिए जानी जाती थीं। किण्वित अंगूर के रस से शराब बनती है, जो संकोच को दूर करने और आकर्षण बढ़ाने के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि, शेक्सपियर के 'मैकबेथ' में पोर्टर व्यंग्यपूर्वक कहता है, 'शराब 'इच्छा' को उत्तेजित करती है, लेकिन 'प्रदर्शन' को कम कर देती है।' शहद, कामसूत्र में यौन शक्ति बढ़ाने के लिए और आधुनिक 'हनीमून' नवविवाहित जोड़ों द्वारा शादी के पहले महीने में शहद युक्त मदिरा पीने की पुरानी प्रथा की याद दिलाता है।
मठों में वर्जित रहे कई खाद्य पदार्थ
चावल और गेहूं जैसे अनाजों को प्रेम से नहीं, तो प्रजनन क्षमता से लंबे समय से जोड़ा जाता रहा है। एवेना सैटिवा (हरा जई), कई बिना प्रिस्क्रिप्शन के मिलने वाली यौन उत्तेजक दवाओं का एक घटक है। तुलसी, पुदीना, दालचीनी, इलायची, मेथी, अदरक, काली मिर्च, केसर और वेनिला जैसी कई जड़ी-बूटियां, मसाले कामोत्तेजक गुणों के कारण प्राचीन मठों में वर्जित खाद्य पदार्थों की सूचियों में भी दिखाई देते हैं।
काले सेम, एवोकैडो और मशरूम
पिछली शताब्दियों में चर्च द्वारा प्रतिबंधित अन्य व्यंजनों में काले सेम, एवोकैडो और चॉकलेट शामिल थे, जिन्हें संभवतः 'पवित्रता के लिए खतरा' माना जाता था। कवक (मशरूम) 'ट्रफल्स' ने प्राचीन अरब में धार्मिक व्याकुलता पैदा की थी। एक कहानी के अनुसार, सेविले के मुहतसिब ने मस्जिद के आसपास कहीं भी इनकी बिक्री पर रोक लगाने की कोशिश की थी, इस डर से कि ये अच्छे मुसलमानों के नैतिक मूल्यों को भ्रष्ट कर देंगे। उत्तेजक गुणों के लिए प्रसिद्ध जड़ी-बूटी 'वैलेरियन' लंबे समय से वेश्यालयों में लोकप्रिय थी, और सामंती जापान में पेशेवर वेश्याएं, जिन्हें यु-जो कहा जाता था, ईल, कमल की जड़ और भुने हुए न्यूट्स के कामोत्तेजक गुणों से अपने सम्मोहन को बढ़ाती थीं।
डार्क चॉकलेट, शहद और बादाम
कहा जाता है कि क्लियोपेट्रा अपने अंगों पर शहद और बादाम का मिश्रण मलती थी, जिससे मार्क एंटनी पागल हो जाता था। मार्क एंटनी और क्लियोपेट्रा के प्रेम प्रसंग के बारे में बहुत सी बातें लिखी गई हैं, लेकिन इस तरह के सौंदर्य प्रसाधनों का कोई कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि एज़्टेक शासक मोंटेज़ुमा अपने हरम में जाने से पहले पचास कप से भी ज़्यादा डार्क चॉकलेट खाकर खुद को शक्ति प्रदान करता था। मोंटेज़ुमा के बारे में यह दावा एक लोककथा है, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। कहा जाता है, कि मैडम डू बैरी ने कस्टर्ड में अदरक मिलाकर लुई XV को कामुक बना दिया था। ग्रीक देवी एफ़्रोडाइट, जो काम की देवी हैं, इस शब्द की उत्पत्ति उन्हीं के नाम से हुई है। एफ़्रोडाइट पौराणिक कथाओं में समुद्र से जन्मी मानी जाती हैं, इसलिए कई तरह के समुद्री भोजन को कामोत्तेजक माना जाता है।
शुक्रवर्द्धक खाद्य पदार्थ
कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट और कॉन्स्टेंटाइन द अफ्रीकन अलग अलग शख्सियतें थीं। 'कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट' ईसाई धर्म अपनाने वाले पहले रोमन सम्राट थे, जिन्होंने 306 से 337 ईस्वी तक शासन किया। कॉन्स्टेंटाइन ने तीन तरह के खाद्य पदार्थों की पहचान की, जो सीमन बनाने में खास तौर पर मददगार होते हैं। छोले (चना), जो मध्यकाल में कामोत्तेजना बढ़ाने वाला बेहतरीन खाद्य पदार्थ माना जाता था। वीर्यवर्द्धकों में मांस, भेजा, अंडे की जर्दी, काली मिर्च और वाइन शामिल थे। दूसरी ओर, खीरा, खरबूजा, सलाद पत्ता और मछली जैसे ठंडे खाद्य पदार्थों के बारे में माना जाता था, कि वे शुक्र बनने में बाधा डालते हैं, और कामेच्छा को खत्म करते हैं।
प्रदर्शन से जुड़ी फ़ूड थेरेपी पर शोध
जो लोग सही पोषक तत्वों का ध्यान नहीं रखते, उनमें अन्यों की तुलना में लिबिडो और स्टेमिना की कमी देखने को मिलती है। हर युग में समाज का सक्षम वर्ग ऐसे आहार की तलाश में रहा है। चिकित्सा लेखक यौन विषयों पर बात करने से हिचकिचाते नहीं थे। अहमद इब्न अल-जज़्ज़ार (898-980) ट्यूनीशिया के एक डॉक्टर थे, जिन्होंने पुरुषों को यौन व्यवहार के हवाले से फ़ूड थेरेपी पर काफी शोध किया था। इसमें चने और शलजम जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों से लेकर सावधानी से तैयार किए गए खास मिश्रण और पेय पदार्थ शामिल हैं। अहमद इब्न अल-जज़्ज़ार इतने सफल हुए, कि अपने पीछे 24,000 सोने के दीनार और 1,125 किलोग्राम किताबों का संग्रह छोड़ गए।
ग्यारहवीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध चिकित्सा विद्वान और भिक्षु थे कॉन्स्टेंटाइन द अफ्रीकन। उनकी कई रचनाओं में से एक है 'डी कोइटु', जो मुख्य रूप से संसर्ग की क्रिया, शारीरिक कार्यों और पुरुष प्रजनन अंगों से संबंधित विकारों का अध्ययन करती है। जिसमें वे बताते हैं कि कौन से खाद्य पदार्थ सीमन बनाते हैं और यौनिक क्रिया के लिए उकसाते हैं, और कौन से शुक्र को सुखाते और कम करते हैं; ताकि पुरुष अपनी स्थिति के अनुसार सही खाद्य पदार्थ खा सकें, या उनसे परहेज कर सकें।
इब्न बतूता के 'रिहला' में कामोद्दीपक
इब्न बतूता के यात्रा वृत्तांत 'रिहला' में मालदीव के लोगों के खान-पान का जो ब्यौरा दिया है, वह मुख्य रूप से उनके भोजन के कामोत्तेजक गुणों पर केंद्रित है। बतूता इस बात को साबित करने के लिए अपनी चार स्थानीय पत्नियों के साथ अपने अनुभवों का ज़िक्र करते हैं। इसी तरह, मरहटा की महिलाओं के वर्णन में उन्होंने उनके रति 'आनंद' और 'यौन व्यवहार की जानकारी' का भी ज़िक्र किया है। इब्न बतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत में मालदीव के हवाले से नारियल के कामोत्तेजक गुणों का विशेष उल्लेख किया है, जहां के स्थानीय लोग इसे यौन शक्तिवर्धक मानते थे। लेकिन, केवल मछली और नारियल का कॉम्बिनेशन ही क्यों? और भी आहार हॉर्मोन्स के स्राव और यौन अंगों को उत्तेजित करने में मदद करते हैं।
प्रतीकात्मक उत्प्रेरक पदार्थ
खास अंगों से मिलती-जुलती आकृति और बनावट वाली वस्तुओं को पौरुष और प्रजनन क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता था। शतावरी, समुद्री खीरा और जिनसेंग, गूदेदार अंजीर, आड़ू और सीप इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अन्य प्रतीकात्मक कामोत्तेजक पदार्थों में सफ़ेद मूसली, हिमालय में पाया जाने वाला यारसा गुम्बा, शिलाजीत, पौरुष या प्रजनन क्षमता के लिए असरदार माने जाते हैं। कहा जाता है कि मार्क्विस डी साडे, पौरुष शक्ति बढ़ाने के लिए स्पैनिश फ्लाई का सेवन करते थे। उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी सैनिकों की एक पूरी टुकड़ी कैंथारिडिन से भरपूर भृंगों को खाने वाले मेंढकों का सेवन करने के बाद लंबे समय तक 'सावधान' मुद्रा में खड़ी रही थी।
अफ्रीका के योहिम्बे वृक्ष से प्राप्त योहिम्बाइन नामक दवा कुछ पुरुषों में पौरुष रक्षा करने में सहायक प्रतीत होती है। आंकड़ों से पता चलता है, कि यह प्लेसीबो (मनोवैज्ञानिक रूप से) की तरह काम कर सकती है, लेकिन मूत्र रोग विशेषज्ञ फिर भी इसे लिखते हैं ताकि रोगी को अधिक जटिल उपचारों से बचाया जा सके। माना जाता है, इसका असर दिखने में तीन से छह महीने लगते हैं।
दावे कोकीन को लेकर भी
1980 के दशक से, कोकीन को एक संभावित कामोद्दीपक के रूप में लोकप्रियता मिली है, क्योंकि इसके उपयोग से यौन व्यवहार में वृद्धि होने का दावा किया जाता है; मारिजुआना और एमाइल नाइट्राइट की यह प्रतिष्ठा आम तौर पर 1960 के दशक से ही रही है। फिर भी, हेरोइन के पुराने उपयोगकर्ताओं की तरह, कोकीन के पुराने उपयोगकर्ता अक्सर यौन रुचि और क्षमता में कमी की शिकायत करते हैं; इसलिए शराब या अन्य नशीली दवाओं को यौन उत्तेजक के रूप में उपयोग करने का कोई औचित्य नहीं है।
मीठा और एनर्जेटिक पान
मालूम नहीं, वो नवाब अवध के थे, या मालवा के? मगर उनके हवाले से इस कथा को लोग चाव से सुनाते हैं, कि किसी ने नवाब साहब का उगला पान चबा लिया था, और वो कामातुर होकर बौरा गया। आज की तारीख़ में भी आपको केवल अवध नहीं, मालवा क्षेत्र (विशेषकर इंदौर) में भी उत्तेजक पान के रसिक मिलेंगे। यह एक विशेष प्रकार का मीठा और एनर्जेटिक पान है, जो अपनी खास जड़ी-बूटियों के कारण जाना जाता है।
कामसूत्र और भर्तृहरि संहिता में पान का संबंध यौन क्षमता से जुड़ा बताया गया है। कामसूत्र में बताया गया है कि पान में कुछ खास चीजें डालकर खाने से पौरुष शक्ति बढ़ती है। कुछ पुराने नीम-हकीम और आयुर्वेद के जानकारों की मानें तो पान के पत्ते पर कुछ खास चीजें शिलाजीत-मूसली वग़ैरह डालकर उन्हें तीव्र प्रभावी बनाया जाता था। कई मध्यकालीन इतिहासकारों ने लिखा है, कि मुगल बादशाह हरम की रानियों के पास जाने से पहले खास तरह का पान खाया करते थे। ऐसा कहा जाता है कि जब मुगल भारत आए थे, तब उन्होंने पान का इस्तेमाल माउथ फ्रेशनर के रूप में किया था। 18वीं और 19वीं सदी के दौरान, अवध के शाही दरबारों में पान के पत्ते का एक खास वर्शन तैयार किया गया। माना जाता था कि यह पुरुषों की मर्दानगी और जोश को बढ़ाता है। लेकिन, केवल पुरुषों के लिए नहीं, महिलाओं के लिए भी खास पान भी तैयार किये जाते थे। महिलाओं के लिए जो पान बनाया जाता था उसमें सफेद मूसली , केसर और गुलाब जैसी चीजें मिलाई जाती थीं।
मगर, पान के पत्ते का सीधे तौर पर बेहतर परिणाम से संबंध दिखाने वाले आधुनिक सबूत बहुत कम हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ पारंपरिक चीज़ें जो पान में मिलाई जाती हैं, वे संसर्ग की क्षमता को कम भी कर सकती हैं। इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक रिहला में पान का विस्तार से वर्णन किया है, लेकिन उन्होंने इसे काम बढ़ाने का साधन नहीं बताया। इसके बजाय, उन्होंने पान को भारत की एक सामान्य आदत, मुंह को ताज़ा रखने वाला, और भारतीय संस्कृति में आदर-सत्कार व मेहमाननवाज़ी का प्रतीक बताया।
मालवा के सुल्तान ग़ियात शाह का 'निमतनामा'
ग़ियात शाह (1421-1501) 15वीं शताब्दी में मालवा की सल्तनत के एक प्रसिद्ध सुल्तान थे। वे अपने विलासी जीवन के अलावा खान-पान के शौक के लिए जाने जाते थे। जिस वजह से ग़ियात शाह को आज भी सबसे ज्यादा याद किया जाता है, वह है उनकी किताब 'निमतनामा'। उल्लेखनीय है कि फ़ारसी में 'निमत' शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं। अगर इसके साथ 'ख़ाना' जोड़ दिया जाए, तो इसका अर्थ होता है रसोई या भंडारगृह।
पुस्तक की शुरुआत में तिलचट्टों की स्तुति
माना जाता है कि यह किताब 1495 से 1501 ईस्वी के बीच लिखी गई। यह कहना कि 'निमतनामा' चौंकाने वाले तथ्यों से भरा है, शायद एक कम-बयानी होगी। इस किताब की शुरुआत होती है तिलचट्टों की स्तुति से- हे तिलचट्टों के महान सुल्तान! पाक-कला को समर्पित मेरी इस भेंट को कृपया बख्श दें।'
ताकि कीड़ों से सुरक्षित रहे किताब
फ़ारसी भाषा के विद्वान फ्रांसिस जोसेफ स्टेनगास के अनुसार, 'भारत समेत कई देशों के प्राचीन ग्रंथों में इस प्रकार की एक आरंभिक मंगलाचार की परंपरा थी, जिसका उद्देश्य यह होता था, कि कीड़ों से किताब की रक्षा की जा सके। अर्थात, अगर लेखक सीधे तिलचट्टों के राजा को संबोधित कर ले, तो उसकी किताब बच जाएगी।'
खास खाद्य पदार्थों की विधियां
'निमतनामा' में सबसे ज्यादा चर्चा जिन हिस्सों की होती है, वे हैं उद्दीपक खाद्य पदार्थों की विधियां। ग़ियात शाह इन्हें लेकर संकोची नहीं थे, जैसा कि स्वाद के प्रेमी पूर्ववर्ती शासक अक्सर रहा करते थे। उत्प्रेरक भोज्य पदार्थों की परंपरा निःसंदेह बहुत पुरानी है, लेकिन प्राचीन ग्रंथों में इनके विस्तृत विवरण बिरले ही मिलते हैं। इस पुस्तक में हर नुस्खे के साथ चरम सुख में ज़बरदस्त वृद्धि की अनोखी रेसिपी है। फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की प्रसिद्ध विधि के साथ दुष्प्रभावों की एक सख्त चेतावनी भी है। इसके लिए सामग्रियां जुटाना कोई मुश्किल नहीं है। जावित्री, लौंग, खसखस, केसर, अजवायन और चमेली-हर एक की पांच दिरहम यानी करीब 3 ग्राम मात्रा चाहिए।
मांडू के आलीशान महल
कहा जाता है कि 15वीं सदी के रंगीले शासक ग़ियात शाह के पास भरा-पूरा हरम था, और उन्होंने मांडू के कई आलीशान महल भी बनवाए थे। उस समय मांडू, मालवा की राजधानी थी। ऐसा प्रतीत होता है, कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में, जब वे पहले की तरह ग़ियात शाह फुर्तीले नहीं रहे। चुनांचे, शाह को अपने विभिन्न आवासों की खड़ी और घुमावदार सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए अपनी रखैलों की सहायता की आवश्यकता पड़ती थी। कहा जाता है, कि हर सीढ़ी पर युवतियां सहारा बादशाह सलामत को देतीं थीं!
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
