आज के दौर में कोई भी डिग्री कैरियर की न गारंटी है व न मंजिल, बल्कि इसे महज शुरुआत के लिए एक पड़ाव कह सकते हैं। दरअसल, रोजगार या नौकरी के लिए केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि व्यावहारिक कौशल, इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट, पोर्टफोलियो और प्रॉब्लम सॉल्विंग की क्षमता आदि चीजें जरूरी हैं।
युवा नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि मूल्य सृजित करने के सामर्थ्य वाले पेशेवर बनें।
हर साल हजारों युवा डिग्री लेकर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से निकलते हैं। हाथ में प्रमाणपत्र होता है, आंखों में उम्मीद और मन में एक सीधा-सा सवाल-'अब नौकरी कहां मिलेगी?' लेकिन शायद आज इस सवाल को थोड़ा बदलने की जरूरत है। 'नौकरी कहां मिलेगी?' से पहले यह पूछा जाना चाहिए- 'मैं नौकरी के लिए क्या लेकर आया हूं?' यहीं से डिग्री और कैरियर के बीच का फर्क शुरू होता है। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक स्नातक हैं, लेकिन डिग्री धारक और नौकरी के लिए तैयार युवाओं के बीच अभी भी एक अंतर दिखाई देता है। समस्या यह है कि पढ़ाई और काम के बीच का पुल अक्सर अधूरा रह जाता है।
डिग्री अंत नहीं, एक पड़ाव
डिग्री को हम अक्सर मंजिल की तरह देखते हैं-चार वर्ष पढ़ाई, परीक्षा, परिणाम और फिर कैरियर। वास्तव में डिग्री एक पॉज़ बटन है, पूर्ण विराम नहीं। यह बताती है कि आपने एक विषय को व्यवस्थित रूप से पढ़ा है। लेकिन नौकरी की दुनिया यह जानना चाहती है कि उस ज्ञान को वास्तविक परिस्थिति में इस्तेमाल करने की आपकी क्षमता कितनी है। एक फिजिक्स स्नातक से केवल फिजिक्स के सूत्र नहीं पूछेंगे। उनसे यह भी पूछा जाता है कि वह किसी समस्या तक कैसे पहुंच सकते हैं। एक वाणिज्य स्नातक को केवल लेखांकन अवधारणाएं नहीं, बल्कि डेटा को लोड करना, प्रस्तुत करना और व्यावसायिक संदर्भ में उसका अर्थ निकालना भी आना चाहिए। यानी काम करने की क्षमता हर क्षेत्र में मायने रखती है।
पहली नौकरी की तलाश से पूर्व प्रमाण
नव स्नातक की बड़ी समस्या अक्सर अनुभव की होती है। नियोक्ता पूछता है- 'आपने पहले क्या किया है?' युवा कहता है-'मेरे पास अनुभव नहीं है।' यह एक वास्तविक दुविधा है, लेकिन अनुभव का अर्थ केवल पूर्णकालिक नौकरी नहीं है। कॉलेज में रिसर्च प्रोजेक्ट बनाया गया, किसी संस्था के लिए समाधान बनाया, इंटर्नशिप, किसी प्रतियोगिता में उत्पाद तैयार किया गया या खुद छोटा प्रोजेक्ट शुरू किया -ये सब प्रमाण हो सकते हैं कि छात्रों ने कुछ सीख ली हैं। इसलिए कॉलेज के बाद डिग्री के साथ 'मुझे क्या आता है?' का जवाब तैयार होना चाहिए। ग्रेजुएशन के बाद अगर पूछा जाए-'आप क्या कर सकते हैं?' तो शायद डिग्री आपके विषय का नाम ही बताए, वहीं आपकी क्षमता बताती है कि आप उस विषय से क्या कर सकते हैं। एक युवा कह सकता है- मैं डेटा का विश्लेषण करके रुझानों को हटा सकता हूं। मैं जटिल विषय को सरल भाषा में समझा सकता हूं। मैं बुनियादी स्वचालन उपकरण का उपयोग करके दोहराव काम कम कर सकता हूं। ये वाक्य काम करने की क्षमता वाले हैं। यही इंटरेस्ट सीवी को पेपर से कैरियर डॉक्यूमेंट बनाता है।
'छोटा काम' जैसी कोई चीज नहीं
हमारे यहां छात्र अक्सर सोचते हैं कि असली अनुभव ग्रेजुएशन के बाद ही मिलेगा, लेकिन व्यवसाय की तैयारी के लिए किसी बड़ी कंपनी में चयन जरूरी नहीं है। छात्र अपने कॉलेज की किसी भी समस्या का समाधान खोज सकता है। किसी छोटे व्यवसाय के लिए सोशल मीडिया कंटेंट तैयार कर सकते हैं। स्थानीय स्कूलों के छात्र यहां पढ़ सकते हैं। इन पहलों का मूल्य केवल प्रमाणपत्र में नहीं है। इनका असली मूल्य उस सवाल में है- 'मैंने इससे क्या सीखा और क्या बनाया?'
नौकरी मांगने से पहले काम दिखाएं
युवा अक्सर कहते हैं- 'मुझे एक मौका चाहिए।' लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में इससे बेहतर स्थिति है- 'यह वह काम है जो मैं कर सकता हूं।' यही कारण है कि पोर्टफोलियो में महत्वपूर्ण वृद्धि हो रही है। एक डिज़ाइनर अपने डिज़ाइन दिखा सकता है, एक लेखक अपने लेखन, एक प्रोग्रामर अपना कोड या एप्लिकेशन, एक शोधकर्ता अपना शोध कार्य, एक मार्केटिंग छात्र किसी अभियान का विश्लेषण।
पहला जॉब अंतिम पहचान नहीं
युवा अक्सर पहली नौकरी लेकर भारी दबाव में रहते हैं। उन्हें लगता है कि शुरुआत में गलती हुई तो पूरे कैरियर की दिशा गलत हो गई। पहली नौकरी आपको तीन चीजें दे सकती है-काम का अनुभव, अपनी क्षमता की समझ और अगला निर्णय लेने की बेहतर स्थिति। इसलिए शुरुआती कैरियर में केवल सैलरी पैकेज ही एकमात्र सपना नहीं होना चाहिए। सीखने का अवसर, गुरु, काम की प्रकृति और विकास की क्षमता भी महत्वपूर्ण हैं।
असली कमी एक्सपोज़र की
कई छात्र शैक्षणिक रूप से मजबूत हैं, लेकिन उन्हें कार्यस्थल की भाषा, पेशेवर व्यवहार और वास्तविक चिंताओं का सामना करने का अवसर नहीं मिला। इसके लिए छात्रों को स्नातक स्तर की पढ़ाई के दौरान काम की दुनिया को छूना चाहिए- इंटर्नशिप के माध्यम से, परियोजनाओं के माध्यम से, उद्योग बातचीत के माध्यम से या किसी वास्तविक समस्या पर काम करके। युवाओं को 'नौकरी चाहने वाले' से 'मूल्य निर्माता' बनना होगा। हम ऐसी क्षमता विकसित कर सकें जिससे किसी संस्था, ग्राहक या समाज की वास्तविक समस्या का समाधान हो सके। दरअसल आपका काम आपकी पहचान है, डिग्री नहीं है। कॉलेज में ही अपने अंदर की क्षमता वह तैयार करनी चाहिए, जिसकी नौकरी की दुनिया को तलाश हो।
-लेखिका शिक्षाविद् हैं।
